Wednesday, 13 March 2013

आखिरी दुःख Kavita 109

आखिरी दुःख

यह एक अंत की शुरुआत है।
ख़ुशी को आते देखा मैंने दरवाज़े पर
भाग कर उसका स्वागत किया
सोचा ऐसा क्या बचा रह गया था
जो मैंने अब तक नहीं पाया था?
ज़रूर होगा यह कुछ ख़ास
नए अर्थ होंगे इसके
ज़रूर लिखा होगा यह नसीब में
तभी खुद-ब-खुद चल कर आया है
मैंने इसे कब बुलाया है?

जीवन की आखिरी सौगात है।
इसे अपने आँचल में भर लूं
मन के भीतर कहीं बंद करके रख दूं
जब चाहूं खोलूँ, जब चाहूं देखूं
किसी की नज़र न लग जाए
मेरी ही नज़र न लग जाए
इतना अमूल्य उपहार
आसमान से सीधा
मेरी झोली में आ गिरा?
उफ़ ! उफ़ ! मैं कैसे सम्भलूं?

सुख की भी होती एक बर्दाश्त है।
यूं ही पड़े नहीं मिल जाते राह पर
हर किसी के भाग्य में नहीं लिखे होते
अनमोल होते हैं ये
कीमत चुकानी पड़ती है फिर भी
खुद मर कर इन्हें ज़िंदा रखना पड़ता है
अपने उसूल तक बेचने पड़ते हैं मुफ्त
पूर्ण समर्पण मांगता है प्यार
प्यार का दुःख भी प्यार ही होता है
बिन सहा रह गया था यह आखिरी दुःख।

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