Friday, 15 March 2013

गिरिजा कुमार माथुर

गिरिजा कुमार माथुर

गिरिजा कुमार माथुर जी को नमन. जब वे दिल्ली रेडिओ में थे, मुझ छोटी सी को उन्होंने कविता पढने के कई अवसर दिए. उन्हें लगता था (शायद सच भी हो) कि उस समय मैं बहुत तेज़-तर्रार कवितायेँ लिखती थी। मेरा शुरूआती दौर था। एक बार उन्होंने 'परिवार नियोजन' पर कविता पढ़ने के लिए बुलाया। कई और कवि भी थे। लेकिन उन्होंने मुझसे जानना चाहां कि मैं कौन सी कविता पढूंगी। मैं एक लघु कविता पढने वाली थी जो इस प्रकार थी ....

क्वारे लड़के और लड़कियों ने
खरीद लिए हैं
पंद्रह पैसे में तीन
कितना आसान हो गया है
बेसुरी बजाना बीन।

माथुर जी ने मुझे डाँटा, बोले, 'तुम तो मेरी नौकरी गंवाओगी।' और मेरी डायरी में से दूसरी कविता चुन कर मुझे पढने के लिए कहा। वैसे मुझ पर उनका असीम स्नेह था। वो नए कवियों को बहुत अहमियत देते थे।

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