Monday, 18 March 2013

साथ जन्मों का Kavita 111

साथ जन्मों का (प्रकाशित : बिंदिया, नवम्बर, '13)

तुम्हारा मेंरा साथ जन्मों का।

लो मैंने मार दिया उसे
जो तुम्हारी साँसों में अटकता था
लो मैंने हार दिया उसे
जो तुम्हारी जीत में खटकता था।
तुम्हारा मेरा साथ युगों का।

तुमने दोहराए सारे वादे
जो मेरे जीवन के संग-संग चलते थे
तुमने लिखी फिर से इबारतें
जिनमें कभी खट्टे-मीठे सपने पलते थे।
तुम्हारा मेरा साथ बरसों का।

मौसम ने लिखा एक गीत
मुड़-मुड़  कर आती बहार के तराने का
बुझ-बुझ कर जल उठे दीप
चमक गया हर कोना मन के वीराने का।
आंसुओं से छूटा रिश्ता पलकों का।

नए दर्शन में घुल गए सब
क्या था असंगत, क्या था अतार्किक
नए अर्थ मिल गए शब्दों को
कोई न सपाट रहा, हुए सब मार्मिक।
मिलन हुआ अपनों से अपनों का।

अवसर की प्रतीक्षा में बैठे जो
मुखर हुए भाव कण कब से चुप्पाए हुए
नासमझ हो गए थे पागल से
अनधिकृत ज्ञान के मारे और सताए हुए।
जन्म हुआ फिर नए सपनों का।

4 comments:

  1. वाह क्या गजब का चित्रण किया है समूचे वातावरण का
    बधाई

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  2. दिनांक 21/03/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. अंतिम पंक्तियों ने बेबाक कही है गहन बात। श्रेष्ठ अभिव्यक्ति।
    हलचल के माध्यम से पहली बार आन हुआ आपके ब्लॉग पर, अच्छा लगा।
    सादर शुभकामनाएं!

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  4. बहुत सुन्दर ...
    पधारें "चाँद से करती हूँ बातें "

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