Saturday, 16 March 2013

संकल्प Kavita 110

संकल्प

जिसे मैंने समझा था जीवन का आखिरी सुख
वह मेरे जीवन का आखिरी दुःख निकला।
मैं नहीं जानती थी कि
किसी पत्थर से टकरा जाऊंगी
और बिना किसी कसूर के
लहुलुहान हो जाऊंगी।
नहीं जानती थी कि
भगवान का प्रसाद जिसे समझा था
वह गरलपान की तरह
हलक के नीचे उतर जाएगा
और मेरी अंतड़ियों को जला कर
राख कर देगा।
कहाँ गए वो दिन
जब मैंने अपने जीवन के पतझर में
बसंत का आना महसूस किया था
क्यों व्यर्थ ही मुस्कुराना शुरू किया था?
मुझे आदत ही नहीं थी मुस्कुराने की
बरसों से संगत में जी रही थी वीराने की।
यह तो कोई बात नहीं हुई कि
हवा का झोंका आए,
शीतल करने की बजाय
सब कुछ बिखरा के चला जाए।
अब समेट रही हूँ तितर-बितर हुए पल
फिर से लिखूंगी विरह का कोई गीत
फिर से लूंगी संकल्प हँसते रहने का।

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