Saturday, 23 March 2013

अमंगल Kavita 112

अमंगल

अत्यधिक भ्रामक होता है प्यार का रिश्ता
हम उसे समझते हैं कुछ
वह हमें समझाता है कुछ और
हम उसे मानते हैं कुछ
वह हम से मनवाता है कुछ और
हम उस से चाहते हैं कुछ
वह हमसे चाहता है कुछ और
हम उसे देते हैं कुछ
वह हम से लेता है कुछ और
हम उस से कहते हैं कुछ
वह सुनता है कुछ और
हम उसके नज़दीक जाते हैं
वह दूर छिटक जाता है
वह हमारे नज़दीक आता है
हम देख नहीं पाते हैं
हम उसके स्पर्श को तरस जाते हैं
उसकी खरोंचें हमारे दिल पर खुदी मिलती हैं
हमारी सारी प्रार्थनाएं श्राप बन जाती हैं
हमारे सारे गान मर्सिया में ढल जाते हैं
हमारे मन की सुन्दरता प्रताड़ित है
पर क्यों उसका रूप इतना भ्रामक है?
हमारे मन में भावों की उथल-पुथल है
पर क्यों उसकी चाल इतनी भयानक है?
हमें भरोसा है किसी दैवी शक्ति पर
पर प्यार का आक्रमण असुराघात है
यह सम्मोहन का जंगल है
जंगल में मंगल है
मंगल में छुपा अमंगल है।

No comments:

Post a Comment