Wednesday, 27 March 2013

मेरे आत्मन ! Kavita 113

मेरे आत्मन ! (प्रकाशित : बिंदिया, नवम्बर, '13)

मेरे आत्मन !
नाम तुम्हारा जब लूं
मन में ज्यों मंजीरे बाजे।

मेरे अन्तरंग !
बोल तुम्हारे सुन कर
तन-मन में चंचलता साजे।

मेरे सुमितम !
रूप तुम्हारा ऐसा
लगते जैसे कोई महाराजे।

मेरे सम्पूरण !
तुम पर मैंने मन से
मन के सब गुण-अगुण नवाजे।

मेरे प्रियतम !
प्रेम कथा रचने को
मन में अनगिन भाव विराजे।

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