Saturday, 16 March 2013

एक सहेली

एक सहेली (प्रकाशित : बिंदिया)

सच है, मैं यादों की गलियों से गुज़र रही हूँ। मेरी एक मित्र है, बड़ी गहरी और अनोखी मित्र। उसके और मेरे बीच उम्र का अच्छा-खासा फासला है। वह मेरे और मेरे पुत्र के बीच में है यानि जितने साल वह बौबी से बड़ी है, उतने ही साल मुझसे छोटी है। हमारे बीच तू-तडाक का रिश्ता है। उसकी मेरी दोस्ती लगभग तीस वर्ष पुरानी है और हमने ज़िन्दगी के अनेकों उतार चढ़ाव साथ-साथ देखे हैं। अनेक बार लडाइयां भी हुईं, बड़ी भयंकर लडाइयां हुईं, लेकिन लड़-लड़ कर हम फिर मिलते रहे। लड़ाइयों के बावजूद जो दोस्तियाँ नहीं टूटतीं, उन्हें मैं अर्जित यानि कमाई हुई दोस्ती कहती हूँ, जिसकी उम्र बहुत लम्बी होती है। वरना जो एक हलके से झटके से चटक जाए, वह क्या दोस्ती? तो हमारी दोस्ती ऐसी थी कि रात-दिन का साथ। पूरी रात बातें करते बीत जाती थी। कहाँ से आती थीं इतनी सारी बातें? पता नहीं पर सिलसिला ख़त्म ही नहीं होता था। एक विचित्र सा दुर्योग था हमारे बीच, उसे मेरी उम्र के लड़के पसंद आते थे और मुझे उसकी उम्र के। हम हंसा करते थे कि उस में पिता-ग्रंथि है, मुझ में पुत्र-ग्रंथि। उसका प्रेम अपने से लगभग 35 वर्ष बड़े व्यक्ति से हुआ, जिससे उसने शादी भी की। आज उस के पति जीवित नहीं हैं लेकिन वह उनसे गहराई से जुडा हुआ महसूस करती है और उनकी यादों के सहारे ही जीना चाहती है।

बीच में मैं अपने 13-14 वर्ष के अज्ञातवास में रही। (संभवतः) 2006 में वह एक दिन अचानक मेरे ई डी एम मॉल वाले शोरूम में मेरे सामने खड़ी थी। 'अरे मणिका, तू यहाँ?' वह अपने पति की साइड की किसी महिला के साथ थी। वह सफ़ेद लिबास में थी। उसके पति का निधन हो चुका था। मैं शोक मनाने भी नहीं गई थी क्योंकि मैं स्वयं अपने मन के अंधेरों से जूझ रही थी इसलिए एकांतवास में थी। मैंने उस से बस इतना कहा, 'सॉरी यार, मैं नहीं आ सकी। क्या करती? मैं अपने में ही नहीं हूँ।'

'कोई बात नहीं। चल, अब अपना फोन नंबर दे।' फोन नंबर लिए-दिए गए। लेकिन उसके बाद न उसने मुझे फोन किया, न मैंने उसे।

2012 से मैं एक मानसिक उलझन से गुज़र रही थी। मुझे किसी से बात करने की ज़रुरत महसूस हो रही थी, किसी ऐसे से जिसकी सेंसिबिलिटी मेरी सेंसिबिलिटी से मेल खाती हो। मुझे अपनी पुरानी प्रिय सहेली का ख्याल आया और अब 2013 में मैंने उसे फोन किया। तो 'तू मेरे घर आ।' 'नहीं, तू पहले आ।' 'नहीं तू पहले।' मेरे घर से उसके घर की दूरी 25 कि मी है। मैंने कहा, 'मैं पहली बार बौबी के साथ आउंगी। घर ढूंढना पडेगा न।' तो एक रविवार को मैं बेटे के साथ उसके घर गई। 'ओह हो, बौबी, तू इतना बड़ा हो गया ! '

उसका घर बेहद खूबसूरत। उसके तीन बेडरूम के घर की भव्य साज सज्जा थी, घर में एक सुन्दर छोटा सा बगीचा भी, बगीचे में फव्वारा, फव्वारे में मछलियाँ। बगीचे में लगी छतरी के नीचे रखी कुर्सियों पर हम बैठे। बस, फिर बातें ही बातें। उस का बात करने का अंदाज़ होता है एकदम दार्शनिक और मेरी बातों में होती हैं कहानियाँ। मैंने उसके अकेलेपन को महसूस किया और पूछा कि आगे के लिए क्या सोचा है? वह बोली, 'उन की यादों से बाहर नहीं निकल पाई हूँ।' उसके बाद मेरी और उस की बातों का मुख्य मुद्दा यह कि हम सन्यासी हैं। बहुत कम उम्र में हमसे जीवन के राग छूट गए।

वह मुझ पर रश्क करे और मैं उस पर।

'मणिका, यू आर लकी, यू हैव अ सन, यू हैव गौट अ फैमिली।'

'ओह डियर, मुझे पुराने दिन याद आ रहे हैं जब मैं अकेली ऐसे ही ठाठ-बाट से रहा करती थी।'

पूरे ठाठ-बाट हों, अकेले रहने का मूड हो, फिर अकेलेपन में अफ़सोस हो कि हाय, यहाँ सब कुछ है, बस एक 'वो' नहीं है, यह सोच कर मन में करूण रस की उत्पत्ति हो, आँखों में आंसू हों, आंसुओं की धारों में चीखें हों, दीवारों से सिर फूटें, और फिर कविता-कहानी का जन्म हो। वाह वाह ! पूर्ण समर्थ स्त्री अकेली रहती है तो मुझे बहुत अच्छी लगती है। मुझे ऐसी महिलाएं बहुत आकर्षित करती हैं जिन्हें पुरुष की ज़रुरत तो होती है पर वे किसी भी ऐरे-गैरे के साथ समझौता करके रहने की बजाय अकेली रहना बेहतर समझती हैं, जिनके लिए विवाह बुनियादी तौर पर ज़रूरी नहीं है, दुनियादारी नहीं है, जिन्हें इज्ज़त के लिए सिर के ऊपर किसी के आश्रय की छत की ज़रुरत नहीं है, जो पुरुष द्वारा पाली जाने की बजाय अपनी पसंद के पुरुष को पालने की हिम्मत रखती हैं। सच में वाह वाह!

बौबी ने उससे कहा, 'दी, हम इसी रास्ते से आपके घर के आगे से होकर आगरा जाते हैं।'

'ठीक है, अगली बार मुझे भी साथ ले लेना। मैं अपनी गाडी में .... अब बौबी, तुम ऐसा करो कि मम्मी को यहाँ छोड़ जाओ, हमें बहुत सारी बातें करनी हैं, पिछले 15 सालों की कहानियाँ कहनी-सुननी हैं।'

लेकिन वैसा संभव नहीं हुआ। 'फिर किसी और दिन मम्मी खुद आ जाएंगी,' बौबी ने कहा। उसके घर से निकल कर कार में बैठते ही बौबी बोला, 'उफ़, कितना बोलती हैं, दी? और आप भी मॉम। कमाल है, आप दोनों अपने को सन्यासिन कह रही थीं. सन्यासी लोग इतना नहीं बोलते।'

'हम सन्यासी इन अर्थों में हैं कि देखो, हमें बहुत भूख लगी है, हमारे सामने अच्छे-अच्छे खाने रखे हुए हैं, फिर भी हम नहीं खाते, हमें कोई लालच नहीं।'

'ओह्हो तो खालो न, किसने मना किया है? वॉट अ बिग डील।'

'हमारी अंतरात्मा रोकती है। हम संयमी हैं। इस प्रकार हम अपने भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा का संचयन करते हैं।'

'जब यह चुनाव आपका अपना ही है, फिर यह अफ़सोस किसलिए?'

'अफ़सोस इसलिए कि अफ़सोस से हमारे अन्दर साहित्य का जन्म होता है।'

'क्या बात है, मॉम, क्या बात है। चित भी अपनी, पट भी अपनी?'

उसके बाद से मेरे और उस के बीच फिर से पुरानी मित्रता नए सिरे से शुरू हुई। फिलहाल हम घंटों फोन पर लगे रहते हैं। हमारी रूचि के कुछ कॉमन विषय हैं। मुख्य विषय है ज्योतिष शास्त्र। उसका कहना है, 'मणिका, तू जो इतने साल अज्ञातवास में रही, इसका कारण उस समय तेरी शनि की महादशा थी। और उसके बाद जो तूने त्वरित गति से दो महीने में 100 कवितायेँ लिख मारीं, उस समय तेरी बुध की महादशा थी।' मैंने उसे कहा, 'तू ही एक दिन आजा।' बोली, 'नहीं, मेरी शनि की महादशा चल रही है। शनि परिवार में जाने से रोकता है। आना तो तुझे ही पडेगा।'

हमारी रूचि का दूसरा मुख्य विषय होता है, बार-बार जिए-मरे रिश्तों की पड़ताल करना यानि बाल की खाल निकालना यानि एक ही चीज़ को बार-बार उधेड़ना और फिर बुनना। इससे हम में ज़िन्दगी को समझने की एक सूक्ष्म दृष्टि पैदा होती है।

तीसरा विषय है,  अपना-अपना लिखा हुआ सुनाना, उस लिखने के पीछे की रचना प्रक्रिया बताना, उस पर मंतव्य देना और साथ ही यह भी खोजना कि वह रचना-विशेष किस पर लिखी और क्यों लिखी गई?

सच, सहेलियां कितनी ज़रूरी होती हैं। हमारा एक-दूसरे के घर रात-रात भर जाग कर बातें करने का सिलसिला जल्दी ही शुरू होने वाला है।

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