Thursday, 7 March 2013

वीतराग Kavita 106

वीतराग

क्यों मन हो जाता है उदास
बार-बार।
सब कुछ रहता है वहीँ का वहीँ
घर के कोनों में सजे हुए दीपदान
आँगन में उग रही हरियाली
दीवार से सटे हुए अशोक के पेड़
गमलों में गेंदा और गुलाब
खिड़की से झाँकता हुआ सुनहरा सूरज
मंद-मंद बहती हुई ठंडी बयार
चाँद का कभी घटना, कभी बढ़ना
फ़िल्मी संगीत, मंदिर की घंटियाँ
नौकरों का आना और जाना
वही दावतें, वही मनोरंजन, वही सैर-सपाटे
अपनों का प्यार, लाड़, तकरार
सब कुछ वहीँ का वहीँ है
सब कुछ वैसा ही है
जैसा रोज़ होता है
पर मन के भीतर की पूरी दुनिया
जो अदृश्य है, अश्रव्य है
बिना कुछ कहे-सुने बदल जाती है
क्यों यह उदासी
दिल पर बार-बार छा जाती है?
कुछ भी तो ऐसा नहीं जो मेरे पास न हो
हर तरह के ऐशो आराम से भरपूर हूँ मैं
क्या मांगू तुझसे मैं और, ओ मेरे भगवन
जायज़ नाजायज़ सब कुछ तो तूने दिया
मेरे देखे बिना सपनों को पूरा किया
फिर भी क्यों मन हो जाता है उदास
बार-बार?
क्यों स्थायी भाव की तरह जुड़ा है मुझसे
यह वीतराग?
क्यों खुशियों के बीच भी फैली है
मनहूसियत?
क्यों ढूंढें नहीं मिल रहा मन का चैन?

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