Thursday, 7 March 2013

वैराग्य Kavita 105

वैराग्य

मोह माया से आत्मा अशुद्ध हुई
राग ने अपवित्र किया अंतस को
प्रेम के बहाने से चंचल हुआ मन
सारे आकार विकार में बदल गए।

ज्ञान सारा हुआ धूल धूसरित
जो भी कमाया था, खो गया
उजालों से चमका जो परिवेश
ज़रा सा पोंछा और मिट गया।

उँगलियों पर गिन लो अनेकों उजास
सबने अंधेरों की मार मारी है
सारी शंकाएं दूर होती हैं तब
अकेले में प्रश्न जब उगते हैं।

वापस लौटना है अपनी खोह में
एकांत में दार्शनिक प्रकाश है
भीड़ में ऊबता है मन बार-बार
सिर्फ एक से आगे नहीं बढ़ना है।

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