Friday, 8 March 2013

सीमाएं Kavita 108

सीमाएं

तुम रोज़ मेरा एक हिस्सा काट कर फ़ेंक रहे हो।
मैं टुकड़ों में मर रही हूँ।
क्यों नहीं तुम एक साथ काट देते मुझे?
रोज़-रोज़ का दंश असहनीय होता है।

मेरे दिल का खून करके बैठे हो तुम।
यह दिल का मामला है निर्मोही।
मैंने क्या कह दिया कि तुम्हें सात खून माफ़
तुम तो सचमुच गिन गिन के मार रहे हो।

तुम्हारे मन में कोई पछतावा नहीं
पछतावे के चिन्ह तुम्हारे चेहरे पर नहीं
जैसे इस काम में तुम निपुण हो
अपनी कला को आजमाने आए थे मेरे पास?

मुझे छू कर पवित्र होना चाहते थे?
मुझे देवी का दर्जा इसीलिए दिया तुमने?
मुझे छू कर धुलेंगे तुम्हारे पाप?
मुझे छूना कितना ज़रूरी था तुम्हारे लिए।

मैं सच में तुम्हें छू कर हो गई पवित्र
जैसे इस जन्म में पहली बार छुआ हो किसी को।
पर मैं मन के रास्ते तुम तक पहुंची थी
और बीच राह से वापस लौट आई।

अब तुम मुझे देवी कहो या दानवी
अक्षुण्य प्यार देने का वादा करो या न करो
अब हमारी सीमाएं निर्धारित हैं
तुम अपने देश, मैं अपने देश।

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