Thursday, 28 March 2013

तुम्हारे बिना Kavita 114

तुम्हारे बिना

मैंने तुम्हारा चित्र फ्रेम से निकाल दिया है
अब खाली फ्रेम तुम्हारी याद दिला रहा है।
तुम्हारी छवि घर में चारों ओर नज़र आती है
मैं मस्तिष्क को झटक देती हूँ
कल्पना की आँखें देख ही लेती हैं फिर भी
कि तुम वहां सोफे पर बैठे थे
कि तुमने इस प्याले में चाय पी थी
कि खाने की मेज़ पर तुम्हारे हाथ से
चम्मच छूट कर खन्न से बजा था
कि तुम्हारी उपस्थिति से
मेरा घर सच में सजा था।
तुम बार-बार आए थे
तुमने हर बार नए सपने दिखाए थे
भविष्य के नक़्शे बनाए थे
मुझे नए सिरे से रचा था
प्रेम पर लिखा गया था जो महाकाव्य
उसकी परिकल्पना तुम्हारी थी
भावनाओं की कितनी ज़बरदस्त बमबारी थी।
आज भी सुनाई पड़ते हैं वो शब्द
जो तुम्हारे होठों से निकलते थे 
तो लगातार निकलते ही चले जाते थे
कितना कुछ था तुम्हारे पास कहने के लिए?
मुझे लगता, मैं तुम्हारे जैसी हो रही हूँ
तुम में हमेशा-हमेशा के लिए खो रही हूँ
अब ढूंढें न मिलूंगी खुद को भी।
मुझे अच्छे लगते थे तुम्हारे शब्द
तुम्हारी आवाज़ मुझ में गहरे उतर जाती थी
तुम्हारे अंदाज़ बहुत घातक थे
कितनी बातें करते थे तुम?
मैं बस तुम में रहती थी गुम।
मुझे लगता, मैं तुम जैसी हूँ, तुम मुझ जैसे
जैसे दो किनारे
क्षितिज पर जाकर एक हो गए हों।
तुम्हारा आना और तुम्हारा जाना
नियति का एक भयंकर मज़ाक था
मज़ाक-मज़ाक में जैसे हम खेले हों
खेल कर भूले हों
भूल कर जागे हों
जाग कर रोए हों
रो-रो कर सपनों में बार-बार खोए हों।
लो, मैंने सपने को खुद तोड़ दिया
पर जीना मुझे इसी टूटे सपने में है
तुमसे मिलने के बाद
तुमसे बिछड़ने के बाद
मुझे जीने की लगन
नहीं और किसी अपने में है।

4 comments:

  1. भावुक अनुभूति
    सुंदर रचना
    बधाई

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    1. हार्दिक आभार, ज्योति खरे जी।

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  2. बेहतरीन


    सादर

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