Wednesday, 24 April 2013

ग़ज़ल 17

ग़ज़ल 17

तूने चर्चा किया है प्यार का यूं खुलेआम
भूलूँ तो भूल भी जाऊँ पर भूलूं कैसे?

ज़माने भर को पता चल गया कि कुछ तो है
छुपाना चाहूँ भी अब तो पर छुपालूँ कैसे?

तेरी यह गैर-जिम्मेदाराना हरकत थी
गिरती विश्वास की दीवार सम्भालूँ कैसे?

घाव कितना ही बड़ा हो, कभी तो जाएगा भर
तुझसे मिलने के लिए दिल को मना लूँ कैसे?

तेरी नज़रों में अहसासों का कोई मोल नहीं
मेंरा दिल दिल नहीं, यह बात मान लूँ कैसे?

तेरे जाने के बाद कम नहीं था तेरा गम
हँसती रहती हूँ, सबके सामने रोलूँ कैसे?

सितारे दिख तो रहे हैं पर बहुत दूर हैं
छूने की आस लगाऊँ भी तो छूलूँ कैसे?

Tuesday, 23 April 2013

कोई होता Kavita 117

कोई होता

कोई होता
जो पास बैठ कर अपने
दिल की कहता सुनता।

कोई होता
जो जगी हुई आखों से
संग में सपने बुनता।

कोई होता
जो मौसम से बेपरवाह
सहरा में फूल चुनता।

कोई होता
जो शब्दों को दूर हटा
मौन की भाषा गुनता।

कोई होता
जो डूबे-डूबे से ये
आँखों के मोती चुनता।

कोई होता
जो खालीपन भरने को
अधरों पर हँसी बुनता।

कोई होता
जो बाहर के शोर तले
बिन बोले आहें सुनता।

कोई होता
जो मेरे पागलपन को
अपने जीवन में गुनता।

Sunday, 21 April 2013

छोटी कविता : 8

छोटी कविता : 8

मेरी उम्र का हिसाब न लगाए कोई
उसके मिलने के बाद से यूं ही घट रही है रोज़
वह उम्र मेरी कम करके चला गया।
मैं खुद फ़िक्र में हूँ
उसके आते-आते कहीं ख़त्म न हो जाऊँ।
उसे पाने की ख्वाहिश में
खुद न खो जाऊँ।

Monday, 15 April 2013

गरलपान Kavita 116

गरलपान

उसके सितारे कुछ इस कदर गर्दिश में थे
कि मेरी कोई भी दुआ काम नहीं आई।

बहुत चाहा कि उसके हाथ की लकीरों को खुरच दूं
निकलेगा जो खून उससे उसके माथे पर टीका करूँ
उसकी विजय के गीत गाऊँ
उसकी राह में फूल बिछाऊँ
उसके स्वागत में रंगोली सजाऊँ
उसे उसके सपनों से मिलवाऊँ
उसके अंधेरों में रोशनी भरूँ
क्या करूँ और क्या न करूँ?

सुन मेरे मीत !
अभी तेरी ज़िन्दगी में मुश्किल है संगीत
उम्मीदों से परे है जीत
नाकामियों में होड़ लगी है विपरीत
कहाँ से सुनाई देगा कोई मधुर गीत
सूझ नहीं रही दिलासा की कोई रीत
नसों में दौड़ रही है लहर-शीत
स्थानातरित करनी पड़ेगी प्रीत।

अभी हमें सपनों में ही जीना है
बूँद-बूँद रोज़ गरल पीना है।

Friday, 12 April 2013

मेरी दिल्ली

मेरी दिल्ली

मेरी दिल्ली। मेरी प्यारी दिल्ली। दिल्ली की दीवारों के मोह ने मेरा दिल कहीं नहीं लगने दिया, न मुंबई में, न गयाना (दक्षिणी अमरीका) में। मुंबई एवं गयाना में एक ही मौसम रहता है, हमेशा गर्मी और ठंडी हवाएं। ऐसा भी क्या शहर जहाँ सिर्फ एक ही मौसम रहता हो। मैं दिल्ली के बदलते मौसमों की अभ्यस्त हूँ। अब दिल्ली में सतत रहने वाले मुझ जैसे प्राणी को ऐसे शहर में फ़ेंक दिया जाए, जहाँ मौसम ही न बदलता हो, तो यह चिंता का विषय तो था ही। .... दिल्ली में गर्मी की शुरुआत मन को मोह लेती है। खिले-खिले, खुले-खुले दिन।।।। गर्म कपड़ों के बोझ उतरने से हलके हुए शरीर .... ठंडी शामें .... खूब बड़े दिन .... दिन भर सोते रहो, तो भी दिन ख़त्म न हो .... यह सब जब सड़ी गर्मी में परिवर्तित होना शुरू होता है और लोगों के मन में मौसम के प्रति ऊब उभरनी पैदा होती है तो बरसातें अपनी कभी रिमझिम, कभी घनी बौछारों से मन हर लेती हैं। हरे-भरे दिन .... सड़क-सड़क छायादार पेड़ .... चौराहे-चौराहे रंग-बिरंगे फूल .... कॉलोनी-कॉलोनी बागों पे बाग़ .... सर्दियां अपना अलग ही आनंद देती हैं। स्वेटर, शौल, कोट, ठंड से तो बचाते ही हैं, व्यक्तित्व भी निखारते हैं। सर्दियां आते ही दिल्ली का सांस्कृतिक माहौल भी बदल जाता है। नृत्य, नाटक, संगीत .... कार्यक्रमों की चहल-पहल .... त्यौहारों की धूम .... शादियों का मौसम .... जगह-जगह बाजे-नगाड़े .... छोटे-सिमटे हुए दिन .... रात की गोद में जाने के लिए उतावले .... शाम कब आई, कब गई .... जगमगाते बाज़ारों में खरीद-फरोख्त की जल्दी .... मोटी रजाइयों में मीठी नींद .... सब कुछ मीठा-मीठा है मेरी दिल्ली में। हाँ, मैं आजकल नौएडा में रहती हूँ पर यह दिल्ली से इस तरह सटा हुआ है कि एक तरह से दिल्ली ही है.

दिल्ली नुझे बहुत पसंद है, थी, लेकिन मैं ऐडवेंचर और थ्रिल की शौक़ीन .... मुझे कहाँ बाँध कर रख सकती थीं दिल्ली की दीवारें और मौसम .... चुनाव मेरे हाथ में था और मैंने चुन लिया था ज़िन्दगी का अगला पड़ाव मुंबई .... उस समय मुंबई नहीं, बम्बई था .... ज़रा हट के, ज़रा बच के, यह है बॉम्बे मेरी जान .... और मैं बम्बई में घुसने के लिए बेताब। .... दिल्ली से बम्बई आते समय हर परिचित-अपरिचित ने बम्बई को कुछ यूं हौवा बना कर पेश किया था कि यह मेरा अतिरिक्त साहस ही था जो मैं बम्बई में बसने का खतरा उठा पाई। नया शहर, नई ज़िन्दगी, नई हलचल, इन सब का निमंत्रण बहुत आकर्षक था। बम्बई आकर मैं सबसे अधिक प्रभावित हुई बम्बई की भीड़ से। लगातार इतनी भीड़, इतनी मारामारी को देख कर मैं हैरान-परेशान। हर लोकल गाड़ी भीड़ को ढो कर ले जा रही है। ठुंसे पड़े हैं लोग फर्स्ट क्लास के डिब्बों में भी। कोई नया व्यक्ति आए तो एकदम खो ही जाए। मैं खोती रहती थी न जब-तब। .... यह वेस्टर्न, सेन्ट्रल, हार्बर क्या बला है भई? मुझे कैसे समझ में आएंगी ये तीन-तीन लोकल रेलवे? बॉम्बे सेन्ट्रल वेस्टर्न रेलवे में क्यों है, सेंट्रल रेलवे में क्यों नहीं? कैसे समझ में आएगा यह पूरा सिस्टम? चलो, बम्बई का नक्शा खरीदते हैं। ....और मैंने बिना किसी की मदद के पूरा बम्बई ढूंढ निकाला था। मुझे यहाँ हर चीज़ मोह रही थी भीड़ के सिवा। एक बार सिस्टम समझ में आ जाने पर बम्बई को ढूंढना, पहचानना और पसंद करना कठिन नहीं है। पूर्ण अनुशासित, नियमों में बंधा हुआ, हर ओर सुविधाएं, प्रगति के चिन्ह। लेकिन लोगों के चेहरों की हंसी क्यों गायब है? मैं सोचा करती। यहाँ लोग हँसते नहीं। मुरझाए चहरे, भागदौड़ में व्यस्त। काम से काम, किसी को फुर्सत नहीं है जैसे। ऊंची-ऊंची इमारतों के साथ-साथ जुड़ी झुग्गी-झोंपड़ियों की कतार-दर-कतार। और बहुत कुछ ऐसा जो मन को मोह भी रहा था .... मन को मोहता हुआ बम्बई, अपनी ओर खींचती हुई दिल्ली।

जब आठ-दस वर्ष दिल्ली से बाहर रह कर मैं दिल्ली वापस लौटी तो दिल्ली मुझे मोहभंग की स्थिति में पहुंचाती हुई लगी थी। एक तरफ गुरूर भी था कि दिल्ली रौनकी हो गई है, सड़क पर कारों की संख्या बेइन्तहा बढ़ गई है, रात में चारों ओर न्योन लाइट की चमक-धमक है, लेकिन .... हाँ, एक बहुत बड़ा लेकिन हर घडी उभर कर सामने आ रहा था कि दिल्ली की बसों में सफ़र करना दूभर हो गया था। गुंडागर्दी जो बढ़ गई थी इतनी।

Thursday, 4 April 2013

You Lied

You Lied

You told me
You loved me
You lied
Every moment I cried.

You Seriously din't care
For what I felt
Now its really rare
When you see me and melt.

The times you said
'I love you, Baby'
You lied
Every moment I cried.

You seriously din't know
What I was going through
But that's okay
Cause I no longer belong to you.

The times you said
'I love you, Baby'
You lied
Every moment I cried.

But what I feel deep inside
Is love unspoken
The dream of you being beside
Is now broken.

The times you said
'I love you, Baby'
You lied
Every moment I cried.

You told me, you would never leave
And you din't
Its just that now you don't believe
In the slightest hint.

The times you said
'I love you, Baby'
You lied
Every moment I cried.

When I said, I love you
You seriously din't hear
I knew, I kept quiet
Cause you walking away was my darkest fear.

The times you said
'I love you, Baby'
You lied
Every moment I cried.

Wednesday, 3 April 2013

दिलफेंक Kavita 115

दिलफेंक

हम अपने को समझे थे बड़ा ही दिलफेंक
लेकिन वो हमसे भी बड़ा दिलफेंक निकला।

हमने यूं ही उछाला था दिल उसकी तरफ
उसने कितनी सफाई से उसे कैच किया।

उस पर इलज़ाम लगाएं या उसके बनके रहें
अब हम कैद में उसकी, करें तो करें क्या?

अजीब कशमकश में डूबता जाता है मन
फ़िज़ूल में ही यहाँ मेरे दिल का चैन गया।

खेल-खेल में हम खेल गए दिल का खेल
हमारा खेल सच में यूं खिलेगा, क्या था पता।

Monday, 1 April 2013

ग़ज़ल 16

ग़ज़ल 16

महफिले यारां में जाएं कैसे, हमें किसी कमबख्त ने बुलाया ही नहीं
कहो कोई उस नामुराद से, हमें महफ़िल में बुलाने का इंतजाम करे।

अगर हमने महफ़िल में दखलंदाजी की तो पसंद नहीं आएगी उसको
उससे कहो कि चर्चा अगर हमारे प्यार का करना है तो सरेआम करे।

न जाने किस-किस को बुलाया जाता है बेवजह रोज़ अपनी महफ़िल में
उसे तो कोई ना कोई बहाना चाहिए कि हमें फ़िज़ूल में बदनाम करे।

सारी उम्र जो संजो कर रखी थी प्यार की दौलत, हमने उस पर लुटा दी
अब यह उसकी मर्ज़ी, संभाल कर रखे या फिर सरे-बाज़ार नीलाम करे।