Monday, 1 April 2013

ग़ज़ल 16

ग़ज़ल 16

महफिले यारां में जाएं कैसे, हमें किसी कमबख्त ने बुलाया ही नहीं
कहो कोई उस नामुराद से, हमें महफ़िल में बुलाने का इंतजाम करे।

अगर हमने महफ़िल में दखलंदाजी की तो पसंद नहीं आएगी उसको
उससे कहो कि चर्चा अगर हमारे प्यार का करना है तो सरेआम करे।

न जाने किस-किस को बुलाया जाता है बेवजह रोज़ अपनी महफ़िल में
उसे तो कोई ना कोई बहाना चाहिए कि हमें फ़िज़ूल में बदनाम करे।

सारी उम्र जो संजो कर रखी थी प्यार की दौलत, हमने उस पर लुटा दी
अब यह उसकी मर्ज़ी, संभाल कर रखे या फिर सरे-बाज़ार नीलाम करे।

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