Wednesday, 24 April 2013

ग़ज़ल 17

ग़ज़ल 17

तूने चर्चा किया है प्यार का यूं खुलेआम
भूलूँ तो भूल भी जाऊँ पर भूलूं कैसे?

ज़माने भर को पता चल गया कि कुछ तो है
छुपाना चाहूँ भी अब तो पर छुपालूँ कैसे?

तेरी यह गैर-जिम्मेदाराना हरकत थी
गिरती विश्वास की दीवार सम्भालूँ कैसे?

घाव कितना ही बड़ा हो, कभी तो जाएगा भर
तुझसे मिलने के लिए दिल को मना लूँ कैसे?

तेरी नज़रों में अहसासों का कोई मोल नहीं
मेंरा दिल दिल नहीं, यह बात मान लूँ कैसे?

तेरे जाने के बाद कम नहीं था तेरा गम
हँसती रहती हूँ, सबके सामने रोलूँ कैसे?

सितारे दिख तो रहे हैं पर बहुत दूर हैं
छूने की आस लगाऊँ भी तो छूलूँ कैसे?

3 comments:


  1. ज़माने भर को पता चल गया कि कुछ तो है
    छुपाना चाहूँ भी अब तो पर छुपालूँ कैसे?------

    गहन अनुभूति
    सुंदर गजल

    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों

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  2. Ghazal ek adat hai zindagi ko khooasorat nazar se dekhane kee, dil men sama jae to chhooti nahi. N maine ne dushmani dekhi n maine ne dosti dekhi, Vahin sar jhuk gaya mera jahan bhi roshani dekhi. Duaen ghazal ke lie

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