Friday, 12 April 2013

मेरी दिल्ली

मेरी दिल्ली

मेरी दिल्ली। मेरी प्यारी दिल्ली। दिल्ली की दीवारों के मोह ने मेरा दिल कहीं नहीं लगने दिया, न मुंबई में, न गयाना (दक्षिणी अमरीका) में। मुंबई एवं गयाना में एक ही मौसम रहता है, हमेशा गर्मी और ठंडी हवाएं। ऐसा भी क्या शहर जहाँ सिर्फ एक ही मौसम रहता हो। मैं दिल्ली के बदलते मौसमों की अभ्यस्त हूँ। अब दिल्ली में सतत रहने वाले मुझ जैसे प्राणी को ऐसे शहर में फ़ेंक दिया जाए, जहाँ मौसम ही न बदलता हो, तो यह चिंता का विषय तो था ही। .... दिल्ली में गर्मी की शुरुआत मन को मोह लेती है। खिले-खिले, खुले-खुले दिन।।।। गर्म कपड़ों के बोझ उतरने से हलके हुए शरीर .... ठंडी शामें .... खूब बड़े दिन .... दिन भर सोते रहो, तो भी दिन ख़त्म न हो .... यह सब जब सड़ी गर्मी में परिवर्तित होना शुरू होता है और लोगों के मन में मौसम के प्रति ऊब उभरनी पैदा होती है तो बरसातें अपनी कभी रिमझिम, कभी घनी बौछारों से मन हर लेती हैं। हरे-भरे दिन .... सड़क-सड़क छायादार पेड़ .... चौराहे-चौराहे रंग-बिरंगे फूल .... कॉलोनी-कॉलोनी बागों पे बाग़ .... सर्दियां अपना अलग ही आनंद देती हैं। स्वेटर, शौल, कोट, ठंड से तो बचाते ही हैं, व्यक्तित्व भी निखारते हैं। सर्दियां आते ही दिल्ली का सांस्कृतिक माहौल भी बदल जाता है। नृत्य, नाटक, संगीत .... कार्यक्रमों की चहल-पहल .... त्यौहारों की धूम .... शादियों का मौसम .... जगह-जगह बाजे-नगाड़े .... छोटे-सिमटे हुए दिन .... रात की गोद में जाने के लिए उतावले .... शाम कब आई, कब गई .... जगमगाते बाज़ारों में खरीद-फरोख्त की जल्दी .... मोटी रजाइयों में मीठी नींद .... सब कुछ मीठा-मीठा है मेरी दिल्ली में। हाँ, मैं आजकल नौएडा में रहती हूँ पर यह दिल्ली से इस तरह सटा हुआ है कि एक तरह से दिल्ली ही है.

दिल्ली नुझे बहुत पसंद है, थी, लेकिन मैं ऐडवेंचर और थ्रिल की शौक़ीन .... मुझे कहाँ बाँध कर रख सकती थीं दिल्ली की दीवारें और मौसम .... चुनाव मेरे हाथ में था और मैंने चुन लिया था ज़िन्दगी का अगला पड़ाव मुंबई .... उस समय मुंबई नहीं, बम्बई था .... ज़रा हट के, ज़रा बच के, यह है बॉम्बे मेरी जान .... और मैं बम्बई में घुसने के लिए बेताब। .... दिल्ली से बम्बई आते समय हर परिचित-अपरिचित ने बम्बई को कुछ यूं हौवा बना कर पेश किया था कि यह मेरा अतिरिक्त साहस ही था जो मैं बम्बई में बसने का खतरा उठा पाई। नया शहर, नई ज़िन्दगी, नई हलचल, इन सब का निमंत्रण बहुत आकर्षक था। बम्बई आकर मैं सबसे अधिक प्रभावित हुई बम्बई की भीड़ से। लगातार इतनी भीड़, इतनी मारामारी को देख कर मैं हैरान-परेशान। हर लोकल गाड़ी भीड़ को ढो कर ले जा रही है। ठुंसे पड़े हैं लोग फर्स्ट क्लास के डिब्बों में भी। कोई नया व्यक्ति आए तो एकदम खो ही जाए। मैं खोती रहती थी न जब-तब। .... यह वेस्टर्न, सेन्ट्रल, हार्बर क्या बला है भई? मुझे कैसे समझ में आएंगी ये तीन-तीन लोकल रेलवे? बॉम्बे सेन्ट्रल वेस्टर्न रेलवे में क्यों है, सेंट्रल रेलवे में क्यों नहीं? कैसे समझ में आएगा यह पूरा सिस्टम? चलो, बम्बई का नक्शा खरीदते हैं। ....और मैंने बिना किसी की मदद के पूरा बम्बई ढूंढ निकाला था। मुझे यहाँ हर चीज़ मोह रही थी भीड़ के सिवा। एक बार सिस्टम समझ में आ जाने पर बम्बई को ढूंढना, पहचानना और पसंद करना कठिन नहीं है। पूर्ण अनुशासित, नियमों में बंधा हुआ, हर ओर सुविधाएं, प्रगति के चिन्ह। लेकिन लोगों के चेहरों की हंसी क्यों गायब है? मैं सोचा करती। यहाँ लोग हँसते नहीं। मुरझाए चहरे, भागदौड़ में व्यस्त। काम से काम, किसी को फुर्सत नहीं है जैसे। ऊंची-ऊंची इमारतों के साथ-साथ जुड़ी झुग्गी-झोंपड़ियों की कतार-दर-कतार। और बहुत कुछ ऐसा जो मन को मोह भी रहा था .... मन को मोहता हुआ बम्बई, अपनी ओर खींचती हुई दिल्ली।

जब आठ-दस वर्ष दिल्ली से बाहर रह कर मैं दिल्ली वापस लौटी तो दिल्ली मुझे मोहभंग की स्थिति में पहुंचाती हुई लगी थी। एक तरफ गुरूर भी था कि दिल्ली रौनकी हो गई है, सड़क पर कारों की संख्या बेइन्तहा बढ़ गई है, रात में चारों ओर न्योन लाइट की चमक-धमक है, लेकिन .... हाँ, एक बहुत बड़ा लेकिन हर घडी उभर कर सामने आ रहा था कि दिल्ली की बसों में सफ़र करना दूभर हो गया था। गुंडागर्दी जो बढ़ गई थी इतनी।

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