Monday, 15 April 2013

गरलपान Kavita 116

गरलपान

उसके सितारे कुछ इस कदर गर्दिश में थे
कि मेरी कोई भी दुआ काम नहीं आई।

बहुत चाहा कि उसके हाथ की लकीरों को खुरच दूं
निकलेगा जो खून उससे उसके माथे पर टीका करूँ
उसकी विजय के गीत गाऊँ
उसकी राह में फूल बिछाऊँ
उसके स्वागत में रंगोली सजाऊँ
उसे उसके सपनों से मिलवाऊँ
उसके अंधेरों में रोशनी भरूँ
क्या करूँ और क्या न करूँ?

सुन मेरे मीत !
अभी तेरी ज़िन्दगी में मुश्किल है संगीत
उम्मीदों से परे है जीत
नाकामियों में होड़ लगी है विपरीत
कहाँ से सुनाई देगा कोई मधुर गीत
सूझ नहीं रही दिलासा की कोई रीत
नसों में दौड़ रही है लहर-शीत
स्थानातरित करनी पड़ेगी प्रीत।

अभी हमें सपनों में ही जीना है
बूँद-बूँद रोज़ गरल पीना है।

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