Friday, 31 May 2013

या तो Kavita 124

या तो

या तो सर-आँखों पर बैठाओ
या झुको और पांवों को हाथ लगाओ
असमंजस में कुछ नहीं।

या तो शत-प्रतिशत अपनाओ
या शत-प्रतिशत दूर हो जाओ
बीच की कोई स्थिति नहीं।

या तो खाने में पकवान हों
या निर्जल उपवास हो
अल्पाहार स्वीकार नहीं।

या तो चाँद-तारों से भरी रात हो
या अंधेरों में आवास हो
धुंधलके पसंद नहीं।

या तो भावों के ज़लज़ले हों
या मन सन्यासी हो
व्यर्थ की दुनियादारी नहीं।

या तो आंधी-तूफ़ान हो
या सूखा अकाल हो
बेमौसम बरसात नहीं।

या तो किसी का इंतज़ार हो
या कोई ना बहार हो
व्यर्थ खलबली नहीं।

Thursday, 30 May 2013

सोने के सिक्के

सोने के सिक्के

आपने बहुत सी ऐसी बातें सुनी होंगी कि सोने के जेवर की सफाई करने की बात कह कर लुटेरों ने औरतों को मूर्ख बनाया और उनके असली जेवर नकली गहनों से बदल दिए। मेरे साथ एक बार इससे विपरीत हुआ। मेरे शोरूम में एक मजदूर आया और चीज़ों के दाम पूछने लगा। मैंने सोचा, यह क्या खरीदेगा? लेकिन उसने एक छोटी दुर्गा की मूर्ती खरीदी और बोला, 'एक बात कहनी थी। आप मदद करें तो?'
'कहिए।'
'डर रहा हूँ ....'
'बेझिझक बोलो, क्या बात है?'
'मेरे पास कुछ सोने के सिक्के हैं, अगर आप खरीद लें तो?'
'सोने की दुकान पर जा कर क्यों नहीं बेचते?'
'आप खरीद लें।'
'चोरी का माल है?'
'नहीं ....'
'फिर ....'
'हम मिस्त्री हैं, घर बनाने का काम करते हैं, मेरा पूरा परिवार इसी काम में लगा है। ठेकेदार ने एक बहुत पुरानी बिल्डिंग को तोड़ कर नया मकान बनाने का काम दिया था। उस बिल्डिंग की दीवारों को तोड़ने पर हमें वहाँ लगभग तीन हज़ार सिक्के मिले हैं। हमें पूरा विश्वास है कि वे सिक्के सोने के हैं। आप उन्हें कहीं बिकवा दें।'
'तुम इतने विश्वास से कैसे कह सकते हो कि वे सोने के हैं? उनकी जांच करवानी पड़ेगी किसी सुनार से.'
'मैं अभी आता हूँ,' कह कर वह चला गया। एक घंटे के बाद वह अपनी माँ के साथ फिर उपस्थित हुआ। उसकी माँ ने अपने पल्लू से एक पोटली निकाली और उसे खोल कर अपनी दोनों हथेलियों में सोने के सिक्के भर कर मेरे सामने सामने रख दिए। सिक्के सुनहरी रंग में चमक रहे थे। 'ये बदरंग थे, हमने इन्हें रगड़-रगड़ कर धोया तो यह रंगत निकली,' वह बोली।
मैंने कहा, 'मैं किससे पता करूंगी कि ये असली हैं या नकली? आप लोगों ने मुझसे ही बात करने का क्यों सोचा?'
'आप औरत हैं, इसलिए। आदमियों से बात करने की हिम्मत नहीं हुई, कहीं हमें फंसवा दें,' मजदूर बोला, 'आप इनमें से कुछ ले लें, कल तक पता करलें, मैं कल फिर आऊँगा।'
मैंने एक सिक्का उठा लिया। ज्यादा नहीं, एक ग्राम तक का होगा। 'कुल कितने सिक्के हैं आप के पास?'
'तीन हज़ार।'
'कैसे गिने? तुम लोगों को इतनी गिनती आती है?'
'हमें सौ तक गिनती आती है। हमने गिन लिए। आप चाहें तो गिन लें। मैडम जी, हम कई महीनों से इन्हें संभाल-संभाल कर परेशान हो रहे हैं, समझ नहीं आता, इन्हें कहाँ छुपा कर रखें? आप इन्हें बिकवा दें तो हम पैसा लेकर अपने गाँव चले जाएंगे। वहाँ जाकर कोई अपना काम-धंधा करेंगे। मजदूरी छोड़ देंगे।'
मैंने मन ही मन हिसाब लगाया, यदि ये सिक्के वाकई सोने के हैं तो (उस समय के हिसाब से, उस समय रेट सात हज़ार रुपये प्रति दस ग्राम था) इनकी कीमत लगभग बीस लाख रुपये होगी। मैंने उनसे कहा, 'देखो, एक तरह से है तो यह चोरी का माल ही। खुदाई से जो भी चीज़ बरामद हो, उस पर सरकार का हक़ है। कोई बात नहीं, मैं इन्हें बिकवा भी दूं तो इतने पैसे आप कहाँ रखेंगे? मकान खरीदेंगे, कोई व्यापार शुरू करेंगे तो सवाल उठेगा कि आपके पास पैसा कहाँ से आया? यहाँ तक कि आप लोग अपनी हैसियत से ऊपर कपडे भी पहनेंगे तो लोगों की नज़र में आ जाएंगे। आप लोग इस पैसे को सिर्फ खा सकते हैं। इतने पैसे को आप छुपाओगे कहाँ?'
'मैडम जी, बिकने पर कुछ पैसे आप रख लेना, आखिर आप हमारा काम करवाओगे। हम अपनी हैसियत धीरे-धीरे ठीक करेंगे। नहीं तो मैडम जी, हम आपके पास ही छुपा कर रख देंगे। थोडा-थोडा आपसे लेते रहेंगे। लेकिन हमारा नाम कहीं पर ना आए।'
मेरे पास एक सिक्का छोड़ कर वे माँ-बेटे चले गए। मैंने देखा, उस छोटे से गोल सिक्के पर रानी विक्टोरिया का चेहरा बना था। मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानती थी जो पुराना सोना-चांदी खरीदने का काम करता था। मैंने उसे फोन करके कहा कि मुझे कुछ चांदी के सिक्के बेचने हैं। (संयोग से कुछ चांदी के सिक्के मेरे पर्स में थे जिन्हें मैं कई दिन से बेचना चाह रही थी, लेकिन बाज़ार जाने का वक्त नहीं मिल रहा था।) मैंने उस से यह भी कहा कि मेरी दादी के सामान में कुछ पुराने सिक्के निकले हैं, जिनकी जांच करवा के वो भी बेचने हैं। वह जौहरी अपने कांटे आदि के साथ उसी शाम को मेरी दुकान पर आ गया। पहले मैंने उसे चांदी के सिक्के दिए। फिर उसने सोने का सिक्का अपने लाए पत्थर पर घिसा, परखा और कहा, 'असली है। एक ग्राम का है, छह सौ रुपये दूंगा।'
मैंने कहा, 'आज रेट सात सौ का है तो सात सौ क्यों नहीं?'
'ये पुराने सिक्के हैं, विक्टोरिया के ज़माने के। इन्हें खुलेआम खरीद-बेच नहीं सकते। आजकल मार्केट में ये सिक्के काफी हैं। इसे अभी जाकर गला दूंगा। बाकी कब देंगी?'
'आपको फिर फोन करूंगी,' कह कर मैंने उसे वह सिक्का देकर छह सौ रुपये लिए और विदा किया।
अगले दिन वह मजदूर आया। मैंने उसे बताया कि मैंने जांच कराई थी, वह सिक्का असली सोने का है। उसने आगे कुछ नहीं सुना, बोला, 'बाद में आऊँगा, वह सिक्का आप रख लें,' और चला गया। शायद पुष्टि हो जाने के बाद वह ख़ुशी मिश्रित घबराहट संभाल नहीं पाया। शायद उसके बाद वे लोग अपने गाँव चले गए हों। मुझे नहीं मालूम, उनका क्या हुआ।
आश्चर्य की बात देखिए, अभी कुछ दिन पहले फिर एक मजदूर ने इसी तरह की कहानी सुना कर बताया कि उसके पास दस सिक्के हैं, सिक्के क्या, छोटी सी ईंट है, हरेक पर विक्टोरिया का चेहरा है, एक सिक्के का वज़न 950 ग्राम है (यानि 95 तोले, यानि आज के रेट के हिसाब से दस सिक्के लगभग ढाई करोड़ रुपये के।) 'मैं कहाँ बिकवा दूं भई, मैं किसी को नहीं जानती,' मैंने कहा, क्योंकि अब वह पुराना सोना खरीदने वाला ना जाने कहाँ है?
'मैडम जी, आप एक सिक्का ले लें और मुझे सिर्फ दस लाख रुपये दे दें।' (एक की कीमत लगभग पच्चीस लाख है.)
'ओये, मैं कहाँ से ले लूं? मेरे पास दस लाख कहाँ हैं? हाँ, अगर एक लाख में देना है, बिना जांचे-परखे तो ले आओ।'
वह नहीं लाया। उधर बेटे ने चेतावनी दी, 'मारी जाओगी इस चक्कर में। जितने गहने पहने हुए हैं, सब उतार के ले जाएगा।'
मुझे अभी भी यकीन है कि हमारे देश की पुरानी इमारतों की दीवारों में, जड़ों में अंग्रेजों के ज़माने का सोना गड़ा हुआ है। और मुग़ल ज़माने की इमारतों में भी। लेकिन सोने के लालच में इमारतों को ध्वस्त करने का ना सोचा जाए क्योंकि इन इमारतों का ऐतिहासिक महत्त्व है और इनकी पुनर्रचना अधिक महंगी पड़ेगी।

Friday, 24 May 2013

तुम हर क्षण में शामिल हो Kavita 123

तुम हर क्षण में शामिल हो

कभी ख़ुशी, कभी गम
कभी आँखें हंसती, कभी नम
कभी मन में विश्वास, कभी भ्रम
कभी तन का आलस, कभी श्रम
कभी यादों की भूल-भुलैया, कभी क्रम
कभी प्रिय का बिछड़ना, कभी संगम।

कल थी हाय हाय, आज मौजां ही मौजां
कल थी दुविधाएं, आज निश्चित दिशाएं
कल थी मारामारी, आज गूँजती किलकारी
कल आंसुओं की धार, आज हंसी की बौछार
कल मुश्किल था जीना, आज कौन चाहे मरना
कल सब कुछ नहीं नहीं, आज सब कुछ वहीँ का वहीँ।

तुम जब कहो जो, मैं तब सुनूं वो
तुम जब चुप हुए, मन में अँधेरे घुप हुए
तुम जब बोले, कानों में मधुर रस घोले
तुम जब पास थे, सदियों के उल्लास थे
तुम जब दूर हुए, देश-काल मजबूर हुए
तुम जब आओगे, सब कुछ वैसा ही पाओगे।

तुम जब कोई कहानी लिखो, मुझे प्रेम-दीवानी लिखो
मैं जब कोई कविता लिखूँ, तुम्हें भाव-हन्ता लिखूँ
तुम जब कोई गीत रचो, मेरे मन के मीत रचो
मैं जब कोई सपना देखूँ, तुम्हें बहुत ही अपना देखूँ
तुम जब कोई जीवन जीओ, वह मेरा ही जीवन हो
मैं जब कोई जीवन जीऊँ, तुम हर क्षण में शामिल हो।

Wednesday, 22 May 2013

ग़ज़ल 23

ग़ज़ल 23


व्यर्थ ही मैं खुद को यूं बदनाम कर रही हूँ
तुमको लगा कि मैं तुम्हारा नाम कर रही हूँ।

आसानियों में ज़िन्दगी होती गई मुश्किल
मुश्किल था समझना, उसे आसान कर रही हूँ।

आकाश से टूटे हुए तारों को गिनना क्या
अपनी अधूरी प्यास की पहचान कर रही हूँ।

रिश्ते बनाना चाहें भी तो बन नहीं सकते
उलझे हुए हालात का संज्ञान कर रही हूँ।

कुछ हैं तुम्हारे जीने के अंदाज़ निराले
कुछ तुम्हारी विवशता का मान कर रही हूँ।


मुझ पर तुम्हारे प्यार का थोडा सा क़र्ज़ है
दर्द की किश्तों में वह भुगतान कर रही हूँ।

रौद्र रस

रौद्र रस

क्रोध हमारे ह्रदय का एक अनिवार्य भाव है तथा नाट्यशास्त्र के नौ रसों में से एक रस है। कहते हैं, क्रोध सेहत के लिए हानिकारक होता है, क्रोध करने वाले की सेहत के लिए भी और जिस पर किया जाए, उसके लिए भी। बचपन में पढ़ा था कि जब गुस्सा आए तो मुंह में पानी भर लो, मुंह में पानी भरा रहने के कारण कुछ बोल नहीं पाओगे, यानि गुस्सा अभिव्यक्त नहीं कर पाओगे और गुस्सा अपने आप शांत हो जाएगा। आजकल शिक्षित लोग समझदार हैं। उन्हें मुंह में पानी रखने की ज़रुरत नहीं है। वे स्वयं को संयत रखने में समर्थ हैं। उनके भीतर गुस्सा हो भी तो वे बड़े सभ्य ढंग से पेश आते हैं और अपने इस मनोभाव को सामने वाले पर ज़ाहिर नहीं होने देते।  लेकिन समस्या यह है कि यदि किसी एक के प्रति गुस्सा लगातार दिल में जमा करके रखा जाए तो वह एक दिन बड़े विस्फोट का रूप ले सकता है। मैंने कभी कहीं पढ़ा था कि इस विस्फोट से बचने के लिए व्यक्ति को अपने गुस्से का निष्कासन इस तरह करना चाहिए .... किसी कोने में दीवार की तरफ मुंह करके हम उस अपने क्रोध के पात्र व्यक्ति का नाम लेकर उसे ढेर सारी गालियाँ निकालें, उसके नाम पर अपनी सारी घृणा का वमन हम उस दीवार पर कर दें, इस तरह किसी हद तक हमारे भीतर की गन्दगी निकल जाएगी और हमारा मन स्वच्छ, शुद्ध एवं शांत हो जाएगा। यह तरीका, आपको याद हो तो, फिल्म 'जब वी मेट' में भी दिखाया गया है, जब शाहिद कपूर करीना कपूर को उसके तथाकथित प्रेमी को गालियाँ सुना कर उसकी फोटो फाड़ कर फ़्लश करने के लिए कहता है और वह उसके बाद बड़ा सुकून महसूस करती है। मैंने स्वयं इस तरीके को आजमाया है और सफल पाया है। क्रोध की स्थिति में आप भी इस नुस्खे को आजमाएं।

अलग विधाएं

अलग विधाएं

महाकाव्य, प्रबंध काव्य आजकल जैसे पुरानी विधाएं हो गई हैं। ये उस ज़माने में लिखे जाते थे जब कविता तुकान्त होती थी। कविता के अतुकांत और गद्यात्मक हो जाने से, साथ ही उसे अकविता के दौर से भी गुजरने से लोग कविता ही पढ़ लें तो बहुत है। कवितायेँ बहुतायत में लिखी जा रही हैं, शायद इसलिए भी कि गद्यात्मक हो जाने के कारण कविता लिखना आसान समझा जाता है। छंदोबद्ध लिखने वाले भी छंद की ओर ज्यादा ध्यान नहीं देते। लय और तुक कहीं जा रही है, भाव हैं भी या नहीं, कोई ध्यान नहीं देता। पहले कवितायेँ ही लिखी जाती थीं। वीर रस, भक्ति रस, श्रृंगार रस, हर रस की कवितायेँ लिखी गईं लेकिन गद्य साहित्य की रचना उस मात्रा में नहीं हुई। कबीर, रहीम, सूरदास, किसने महाकाव्य लिखा? दोहे, चौपाई, लिख कर सब मशहूर हुए।

कविता वर्सेस महाकाव्य और कहानी वर्सेस उपन्यास को एक ही तराजू में नहीं तोला जा सकता। जो लोग किसी कहानीकार से कहते हैं कि आपने कहानियाँ बहुत लिख लीं, अब आप उपन्यास लिखिए, वो यदि प्रकाशक हैं तो एक जाने-माने कहानीकार के नाम को भुनाना चाहते हैं क्योंकि उपन्यास कहानी से ज्यादा बिकता है। जो मित्र ऐसा कहते हैं, वे नासमझ हैं, उन्हें नहीं पता कि
कहानी और उपन्यास दो अलग-अलग विधाएं हैं। दोनों में एक सामान जो तत्व है, वह है कथा, शायद इसीलिए यह समझ लिया जाता है कि जो लेखक कहानी लिखने में पारंगत है, वह उतना ही सफल उपन्यास भी लिख सकता है। उपन्यास के लिए एक बहुत बड़े फलक, समय और एकाग्रता की ज़रुरत  है। कहानी अपने आप में एक सशक्त विधा है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी तीन कहानियाँ लिख कर ही प्रसिद्ध हो गए। इसलिए यह ज़रूरी नहीं कि हर कहानीकार उपन्यास भी लिख सकता है या उसे लिखना ही चाहिए।

हमारा होना Kavita 122

हमारा होना

अब मैं बस अपने लिए हूँ।
अब तुम बस तुम्हारे लिए हो।

तुम्हारे लिए होना ना होने जैसा था
तुम्हारे लिए थी तो अपने लिए नहीं थी
तुम्हारे लिए थी तो और किसी के लिए नहीं थी
तुम्हारे लिए होने ने मुझे सब से अलग किया
तुम्हारे लिए होने में मैं तुम्हारी भी नहीं हुई
तुम्हारे लिए होना भी कोई होना था?

तुमने तुम्हारे लिए मेरे होने को अपनाया
तुमने तुम्हारे लिए मेरे हँसने पर साथ दिया
तुमने तुम्हारे लिए मेरे रोने पर अभिमान किया
तुमने तुम्हारे लिए मैं जिन्दा हूँ, सच जाना
तुमने तुम्हारे लिए मैं मर सकती हूँ, सच माना
तुमने तुम्हारे लिए मेरे होने में लेकिन क्या पाया?

यह उसी की दुआओं का फल था जो हम मिले
यह उसी का श्राप था जो हम मिल कर भी ना मिले
यह उसी का छल था जो हमें छल गया
यह उसी का खेल था जो उसने हमसे खिलवाया
यह उसी की योजना थी जिसने बनाए-तोड़े स्वप्न
यह उसी कौन? वह ऊपर वाला जिसे किसी ने नही देखा।

अब मन बुझा-बुझा सा है
अब हँसना भी चाहूँ तो कैसे हँसूँ?
अब तुम्हारे नाम पर आँसू खुद-ब-खुद निकल आते हैं
अब तुम्हारी प्रतीक्षा में आँखें पथरा गई हैं
अब तुम्हारा होना होकर भी होना नहीं है
अब मेरा होना होकर भी क्या होना है?

Tuesday, 14 May 2013

ग़ज़ल 22

ग़ज़ल 22

नारंगी गुलमोहर सा यह खिल-खिल जाता मन
आज तुम्हारा ख़त आया कि कुछ कम हुई चुभन।

प्यार नहीं लिखा था तुमने किसी शब्द में भी
फिर भी अपना-सा अहसास दिलाती रही छुवन।

एक तुम्हारी दुनिया इस दुनिया से अलग बसी
इच्छाधारी ख़त्म हुए सब, अब ना होए मिलन।

कर्म तुम्हारे मेरे मन का भी संताप बने
तुम क्या जानो कैसे मेरा ह्रदय बना निर्जन?

मौन हुआ मेरा याचक, मोहमाया-मुक्त हुई
मन में कोई प्यास नहीं, बेगाने हुए सजन।


कैसे-कैसे चित्र सामने आते हैं वीभत्स
और किसी के साथ खड़े देखूं तो होए जलन।

चन्दन-सी शीतलता पाने की हर कोशिश में
अनुरागी मन राख हो गया, सही न जाए तपन।

उस जंगल में रहते-रहते तुम हो गए विचित्र
अब ना कोई पर्दादारी, ना वह प्रेमीपन।

छोडो अब बीती बातों को, जो भी हुआ, हुआ
कि पत्थर की मूरत को मैं कब तक करूँ नमन?


यह सिलसिला पुराना है

यह सिलसिला पुराना है

जब इंद्र देवता ने गौतम ऋषि का रूप धारण कर ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित किया, वह बलात्कार था। यह बात दूसरी है कि रूप धारण करने के कारण वह कर्म म्युचुअल हुआ और उसमें बल का प्रयोग भी नहीं हुआ। इस प्रकार अहिल्या ने किसी शारीरिक तकलीफ का नहीं, बल्कि शारीरिक सुख का अनुभव किया। आश्चर्य है कि उपभोग के दौरान कहीं अहिल्या को यह नहीं लगा कि यह शरीर उसके पति का नहीं, किसी अन्य का है? एक-दूसरे की इतनी पहचान तो हो ही जाती है। हाथ की पकड़ और छुवन ही बता देती है कि यह स्पर्श अपने का नहीं, पराए का है। बाद में यह जानकारी होने पर भी कि वह उसका पति नहीं था, अहिल्या के मन की ग्लानि कहीं सामने नहीं आई। हाँ, दुःख उसे इस बात का रहा कि उसकी किसी गलती के बिना पति ने उसे पत्थर हो जाने का श्राप दिया। फिर संयोग या कमाल देखिए कि पत्थर से पुनः नारी रूप की प्राप्ति भी उसे परपुरुष (राम) के स्पर्श से ही मिली। यहाँ दो प्रश्न मेरे दिमाग में उभर रहे हैं।
1. तो क्या यह सच है कि अहिल्या इंद्र के साथ कर्म में बराबर की हिस्सेदार थी?
2. परपुरुष (सामान्य अर्थ में परनारी भी) के स्पर्श की महत्ता का गुणगान श्रृंगार रस के कवि बिहारी ने भी किया है। उन्होंने परकीया भाव को स्वकीया भाव से ऊपर रखा है। स्वकीया यानि अपनी पत्नी के प्रेम में वह ललक और तड़प नहीं है जो परकीया के प्रेम में होती है। तो क्या परपुरुष के स्पर्श के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता?

इसी सन्दर्भ में एक और बात। राजा-महाराजाओं के ज़माने में जो राजा संतान उत्पन्न करने में अक्षम होता था, उसे अपना वंशज पाने के लिए नियोग द्वारा संतान उत्पन्न करने की सुविधा थी। इसी विषय पर रचित एक नाटक 'सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक' में दिखाया गया था कि रानी को नियोग के लिए जब अन्य पुरुष के साथ रात गुज़ारने के लिए कहा गया तो सुबह होने पर रानी ने राजा के पास लौटने से इंकार कर दिया। .... स्त्री को उसके सुख की राह दिखाने की और उस सुख को पाने के लिए उसका आग्रह .... यद्यपि यह लेखक की कल्पना थी, जो उसने पुराने इतिहास से एक पराश्रित नारी पात्र को उठा कर यह दर्शाना चाहा कि स्त्री द्वारा अपने सुख की खोज और उसकी प्राप्ति के लिए राजपाट तक ठुकरा देने की कहानी मात्र आज की आधुनिकता की देन नहीं है। स्त्री के मन में चल रहे इस द्वन्द का सिलसिला बड़ा पुराना है।

इन दोनों पौराणिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं में पति के होते हुए भी अन्य पुरुष से प्राप्त शारीरिक सुख को महत्त्व दिया गया है। दोनों घटनाएं हमारी अनदेखी और काल्पनिक हैं। लेकिन आज के ज़माने में भी यह तथ्य उतना ही सत्य है, जितना तब था। ना जाने क्यों, यह बात मेरे गले नहीं उतरती। पति-पत्नी के रिश्ते की फिर अहमियत ही क्या रह जाएगी? इस तरह तो समाज में अराजकता फैल जाएगी।

Sunday, 12 May 2013

भ्रम Kavita 121

भ्रम

उसने आईने में देखा
चेहरे की झुर्रियों के पीछे से
एक छोटी सी लड़की झाँक रही थी
नव यौवन के द्वार पर खड़ी
हैरान, परेशान
किसी की प्रतीक्षा में
डब-डब आँखे
एक नाम पुकारने को आतुर
अधखुले होंठ
जैसे बरसों से सोई न हो
बिखरे बाल
बदहवास सी।
सालों साल बीत गए
इसकी उम्र उतनी की उतनी है
जितनी तब थी
जब वह इसे छोड़ कर गया था।
यह बड़ी क्यों नहीं हो रही?
इसकी आँखों में वही पुराने सपने हैं
उन सपनों में वही दहशत है
कि पूरे होंगे या नहीं?
हर उस उम्र का लड़का
इसे अपने उस जैसा लगता है।
यह आईना देखने से डरती है
इसके सपनों का राजकुमार
कहीं खो न जाए।
देख लेना
मरते समय इसकी आँखें खुली होंगी
अतृप्त कामनाएं
आँखों को मुंदने नहीं देतीं।
इसके हिस्से की प्यास
अभी बुझी नहीं है
जीर्ण-शीर्ण काया ले कर
यह अपने मन के भरोसे बुलंदियों पर है
रोज़ हंसती है, रोज़ रोती है
रात भर जगती है, दिन भर सोती है
सुना है इसने
रात को उतरते हैं आकाश से फ़रिश्ते
जो भी मांग लो उनसे
मुरादें होती हैं पूरी।
इसने मुट्ठियों में बंद कर रखे हैं सपने 
झोली में भर रखी हैं आकांक्षाएं
आँखों से टप-टप गिरने को पानी है
होठों पर पसरी है चुप्पी।
यह किसी से कुछ नहीं कहेगी
आकाश के फ़रिश्तों से भी नहीं
बस, अपनी धुन में मस्त
बढ़ रही है मृत्यु-पथ पर
प्रेम-पथ के भ्रम में
पगली कहीं की
ऐसा भी कहीं होता है?
भ्रम को एक साल, दो साल, दस साल
सारी उम्र कोई ढोता है?

Saturday, 11 May 2013

ग़ज़ल 21

ग़ज़ल 21

यह सच है कि अब मिलने कभी न आएगा तू
फिर भी रोज़ हमने तेरा इंतज़ार किया।

सपनों और सितारों की बातें कर-कर के
मेरे भावों का सरासर बलात्कार किया।

मेरी खामोशियों में मुखर हुई हलचलें
प्यार के नाम पर जब झूठा अभिसार किया।

कोई दायित्व तेरा मेरे प्रति था नहीं 
मेरी मासूमियत से जब कि व्यभिचार किया।

मेरे विराग में तूने पिरोया राग को
यह अपराध तूने जैसे बार-बार किया।

तू हर बार सफाई से झूठ बोलता था
तहेदिल से हमने तेरा ऐतबार किया।

कहता था कि तू साथ गुजारेगा ज़िन्दगी
कि दिल का खून भी किया तो साधिकार किया।

यह सच में ही तमाशा सा हो गया जैसे
जो हुआ, उसने बार-बार शर्मसार किया।

कि चार दिन की ज़िन्दगी में चार पल को तू
क्या आया कि हमें मरने को तैयार किया।

Friday, 10 May 2013

श्राप-मुक्त Kavita 120

श्राप-मुक्त

तुमने कहा था
प्रेम में उम्र की कोई सीमा नहीं होती।
तुम्हारे प्रेम को मैंने दोस्ती का दर्जा दिया
तुम्हें श्राप-मुक्त किया।

तुमने कहा था
तुम मुझे देवी बना कर पूजोगे।
तुम्हारी भावना को मैंने पुत्रवत लिया
तुम्हें श्राप-मुक्त किया।

तुमने कहा था
प्रेम, प्रेम, प्रेम, और सिर्फ प्रेम।
तुम्हारे प्रेम को मैंने अपना श्रेय दिया
तुम्हें श्राप-मुक्त किया।

तुमने कहा था
तुम्हारा जीवन उलझनों से भरा है।
तुम्हारे कलंक को मैंने अपने सिर लिया
तुम्हें श्राप-मुक्त किया।

तुमने जो भी कहा था, क्यों कहा था?
मैंने जो भी सहा था, क्यों सहा था?
तुम्हारे हर कहे को मैंने अपने ऊपर लिया
तुम्हें श्राप-मुक्त किया।

ग़ज़ल 20

ग़ज़ल 20

सारे शब्द छंद हुए, सारी व्यथा गुप्त हुई।
स्वर सारे मंद हुए, चुप्पी सर्व युक्त हुई।
फूल बागों में खिले, हवा में अंधड़ चले
तुम औचक गंध हुए, मैं उनींदी सुप्त हुई।
रोशनी की आड़ में, कालिमा बढती रही
मिलन के पल चंद हुए, प्रेम-प्रथा लुप्त हुई।
रोज़ झगडे प्यार के, रोज़ मिलने की तड़प
फ़ालतू के द्वन्द हुए, फ़ालतू की भुक्त हुई।
अधलिखी ही रह गई, महागाथा अजनबी
तुम अन्दर बंद हुए, मैं बाहर मुक्त हुई।

Wednesday, 8 May 2013

दरवाज़ा खोलो Kavita 119

दरवाज़ा खोलो

बुद्धम् शरणम् गच्छामि
धम्मम् शरणम् गच्छामि
प्रभु, तव शरणम् गच्छामि
शेष नहीं कुछ आगामी।

दरवाज़ा खोलो
मुझे आना है।

भीतर जम रही है एक शिला बर्फ की
बाहर झुलस रहा है प्रचंड ताप
अधम-से-अधम को अपनाने की जिद थी
कि शायद कटे मेरा भी कोई पाप।

दरवाज़ा खोलो,
मुझे भीतर आना है।

खंडित हुए सारे भ्रम
नाकामी का रहा हर श्रम
लालसाएं हुई अशेष
पूरा हुआ श्रापों का क्रम।

अब दरवाज़ा खोलो
मुझे आना है।

कितना भोगा सुख, अहा
कितना भोगा दुःख, आह
न गर्व, न पश्चाताप
अब केवल आप ही आप।

अब तो आने दो
तुम्हारे पास आना है।

मा तमसो ज्योतिर्गमय
ख़ाक हुआ प्रभु सारा समय
शांत हुई मन की सब प्रलय
ग्रहण करो यह अंतिम निर्णय।

नीचे की दुनिया देख चुके
अब ऊपर जाना है।

Tuesday, 7 May 2013

मैं तुम पर मरूँ Kavita 118

मैं तुम पर मरूँ

तुम मेरी बेचारगी से लड़ो
मुझे शुद्ध करो।
मैं तुम्हारी नाकामियों से लडूँ
तुम्हें शुद्ध करूँ।

तुम मुझे सँवारो
मेरी गलतियों को हरो।
मैं तुम्हें सँवारूँ
तुम्हारे गुनाह को हरूँ।

तुमने अब तक जो जीया
उसे अनजीया करो।
मैंने अब तक जो जीया
उसे अनजीया करूँ।

मिलन का एक ही अर्थ
तुम मुझे वरो।
अंतस में डूब कर
मैं तुम्हें वरूँ।

कितना कुछ हार चुके तुम
अब न तुम किसी से डरो।
सब कुछ हारने को तत्पर
अब न मैं किसी से डरूँ।

बस दिल की दुनिया रह गई
तुम मुझ पर मरो।
तुम्हें दिल में जीने के लिए
मैं तुम पर मरूँ।

Monday, 6 May 2013

ग़ज़ल 19

ग़ज़ल 19

ज्यों संगीन जुर्म हो गया कोई
हँस-हँस के दुःख रो गया कोई।

उसका आना न कोई आना था
पल भर को आया, लो गया कोई।

हम से कह के कि जल्दी लौटेगा
गुमनाम भीड़ में खो गया कोई।

हमारी रातों को अँधियार कर
कि गहरी नींद में सो गया कोई।

रंग बिखराए जो चाँद सूरज ने
वो बेरहमी से धो गया कोई।

फूलों को सूखने का श्राप मिला
विष से भरे बीज बो गया कोई।

हमें कैद कर के अपने नेह में
सलाखों में बंद हो गया कोई।

Thursday, 2 May 2013

ग़ज़ल 18

ग़ज़ल 18

खाली थी मेरी झोली, भरती चली गई।
नाशुक्री वारदात जब हरती चली गई।

कुछ ऐसा अवमूल्यन हुआ उसकी नज़र में
मैं अपनी ही नज़रों में गिरती चली गई।

एक दिन चमकी जो बिजली मेरे आँगन में
श्वेताभ आभा को अजब करती चली गई।

मैंने जो उसे माँग लिया अपने ईश से
उसकी ही बददुआ मुझे फलती चली गई।

टांगा था उसका चित्र जहाँ ख़ास बीच में
वह खोखली दीवार थी, झरती चली गई।

अब कहाँ से लाऊँ मैं पहले सी तसल्ली
मैं दिन की रोशनी में भी डरती चली गई।

अब वह न मिलेगा मुझे इस जन्म में कभी
मेरी हरेक आशा यूं मरती चली गई।

कहने को दिए थे गुलाब उसने मुझे लाल
काँटों की चुभन भी थी जो डसती चली गई।

किसकी राह देखूं यहाँ आएगा अब कौन?
पागलों सी जिद थी जो चलती चली गई।

जो उम्र कही जाती है कि चार दिन की है
वह उसके इंतज़ार में ढलती चली गई।