Thursday, 2 May 2013

ग़ज़ल 18

ग़ज़ल 18

खाली थी मेरी झोली, भरती चली गई।
नाशुक्री वारदात जब हरती चली गई।

कुछ ऐसा अवमूल्यन हुआ उसकी नज़र में
मैं अपनी ही नज़रों में गिरती चली गई।

एक दिन चमकी जो बिजली मेरे आँगन में
श्वेताभ आभा को अजब करती चली गई।

मैंने जो उसे माँग लिया अपने ईश से
उसकी ही बददुआ मुझे फलती चली गई।

टांगा था उसका चित्र जहाँ ख़ास बीच में
वह खोखली दीवार थी, झरती चली गई।

अब कहाँ से लाऊँ मैं पहले सी तसल्ली
मैं दिन की रोशनी में भी डरती चली गई।

अब वह न मिलेगा मुझे इस जन्म में कभी
मेरी हरेक आशा यूं मरती चली गई।

कहने को दिए थे गुलाब उसने मुझे लाल
काँटों की चुभन भी थी जो डसती चली गई।

किसकी राह देखूं यहाँ आएगा अब कौन?
पागलों सी जिद थी जो चलती चली गई।

जो उम्र कही जाती है कि चार दिन की है
वह उसके इंतज़ार में ढलती चली गई।

1 comment:

  1. सभी शेर खुबसूरत और अर्थपूर्ण हैं डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    lateast post मैं कौन हूँ ?
    latest post परम्परा

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