Monday, 6 May 2013

ग़ज़ल 19

ग़ज़ल 19

ज्यों संगीन जुर्म हो गया कोई
हँस-हँस के दुःख रो गया कोई।

उसका आना न कोई आना था
पल भर को आया, लो गया कोई।

हम से कह के कि जल्दी लौटेगा
गुमनाम भीड़ में खो गया कोई।

हमारी रातों को अँधियार कर
कि गहरी नींद में सो गया कोई।

रंग बिखराए जो चाँद सूरज ने
वो बेरहमी से धो गया कोई।

फूलों को सूखने का श्राप मिला
विष से भरे बीज बो गया कोई।

हमें कैद कर के अपने नेह में
सलाखों में बंद हो गया कोई।

1 comment:

  1. बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति!
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post'वनफूल'

    ReplyDelete