Friday, 10 May 2013

ग़ज़ल 20

ग़ज़ल 20

सारे शब्द छंद हुए, सारी व्यथा गुप्त हुई।
स्वर सारे मंद हुए, चुप्पी सर्व युक्त हुई।
फूल बागों में खिले, हवा में अंधड़ चले
तुम औचक गंध हुए, मैं उनींदी सुप्त हुई।
रोशनी की आड़ में, कालिमा बढती रही
मिलन के पल चंद हुए, प्रेम-प्रथा लुप्त हुई।
रोज़ झगडे प्यार के, रोज़ मिलने की तड़प
फ़ालतू के द्वन्द हुए, फ़ालतू की भुक्त हुई।
अधलिखी ही रह गई, महागाथा अजनबी
तुम अन्दर बंद हुए, मैं बाहर मुक्त हुई।

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