Saturday, 11 May 2013

ग़ज़ल 21

ग़ज़ल 21

यह सच है कि अब मिलने कभी न आएगा तू
फिर भी रोज़ हमने तेरा इंतज़ार किया।

सपनों और सितारों की बातें कर-कर के
मेरे भावों का सरासर बलात्कार किया।

मेरी खामोशियों में मुखर हुई हलचलें
प्यार के नाम पर जब झूठा अभिसार किया।

कोई दायित्व तेरा मेरे प्रति था नहीं 
मेरी मासूमियत से जब कि व्यभिचार किया।

मेरे विराग में तूने पिरोया राग को
यह अपराध तूने जैसे बार-बार किया।

तू हर बार सफाई से झूठ बोलता था
तहेदिल से हमने तेरा ऐतबार किया।

कहता था कि तू साथ गुजारेगा ज़िन्दगी
कि दिल का खून भी किया तो साधिकार किया।

यह सच में ही तमाशा सा हो गया जैसे
जो हुआ, उसने बार-बार शर्मसार किया।

कि चार दिन की ज़िन्दगी में चार पल को तू
क्या आया कि हमें मरने को तैयार किया।

2 comments:

  1. बहुत बढ़िया लिखा है आपने मातृ दिवस की शुभकामनाएं
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post हे ! भारत के मातायों
    latest postअनुभूति : क्षणिकाएं

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