Tuesday, 14 May 2013

ग़ज़ल 22

ग़ज़ल 22

नारंगी गुलमोहर सा यह खिल-खिल जाता मन
आज तुम्हारा ख़त आया कि कुछ कम हुई चुभन।

प्यार नहीं लिखा था तुमने किसी शब्द में भी
फिर भी अपना-सा अहसास दिलाती रही छुवन।

एक तुम्हारी दुनिया इस दुनिया से अलग बसी
इच्छाधारी ख़त्म हुए सब, अब ना होए मिलन।

कर्म तुम्हारे मेरे मन का भी संताप बने
तुम क्या जानो कैसे मेरा ह्रदय बना निर्जन?

मौन हुआ मेरा याचक, मोहमाया-मुक्त हुई
मन में कोई प्यास नहीं, बेगाने हुए सजन।


कैसे-कैसे चित्र सामने आते हैं वीभत्स
और किसी के साथ खड़े देखूं तो होए जलन।

चन्दन-सी शीतलता पाने की हर कोशिश में
अनुरागी मन राख हो गया, सही न जाए तपन।

उस जंगल में रहते-रहते तुम हो गए विचित्र
अब ना कोई पर्दादारी, ना वह प्रेमीपन।

छोडो अब बीती बातों को, जो भी हुआ, हुआ
कि पत्थर की मूरत को मैं कब तक करूँ नमन?


1 comment:

  1. waaaaaaaaaaah waaaaaaaaaaaaah bhot hi behtrin hai bhot khub

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