Wednesday, 22 May 2013

ग़ज़ल 23

ग़ज़ल 23


व्यर्थ ही मैं खुद को यूं बदनाम कर रही हूँ
तुमको लगा कि मैं तुम्हारा नाम कर रही हूँ।

आसानियों में ज़िन्दगी होती गई मुश्किल
मुश्किल था समझना, उसे आसान कर रही हूँ।

आकाश से टूटे हुए तारों को गिनना क्या
अपनी अधूरी प्यास की पहचान कर रही हूँ।

रिश्ते बनाना चाहें भी तो बन नहीं सकते
उलझे हुए हालात का संज्ञान कर रही हूँ।

कुछ हैं तुम्हारे जीने के अंदाज़ निराले
कुछ तुम्हारी विवशता का मान कर रही हूँ।


मुझ पर तुम्हारे प्यार का थोडा सा क़र्ज़ है
दर्द की किश्तों में वह भुगतान कर रही हूँ।

1 comment:

  1. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति.

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