Tuesday, 7 May 2013

मैं तुम पर मरूँ Kavita 118

मैं तुम पर मरूँ

तुम मेरी बेचारगी से लड़ो
मुझे शुद्ध करो।
मैं तुम्हारी नाकामियों से लडूँ
तुम्हें शुद्ध करूँ।

तुम मुझे सँवारो
मेरी गलतियों को हरो।
मैं तुम्हें सँवारूँ
तुम्हारे गुनाह को हरूँ।

तुमने अब तक जो जीया
उसे अनजीया करो।
मैंने अब तक जो जीया
उसे अनजीया करूँ।

मिलन का एक ही अर्थ
तुम मुझे वरो।
अंतस में डूब कर
मैं तुम्हें वरूँ।

कितना कुछ हार चुके तुम
अब न तुम किसी से डरो।
सब कुछ हारने को तत्पर
अब न मैं किसी से डरूँ।

बस दिल की दुनिया रह गई
तुम मुझ पर मरो।
तुम्हें दिल में जीने के लिए
मैं तुम पर मरूँ।

2 comments:

  1. बस दिल की दुनिया रह गई
    तुम मुझ पर मरो।
    तुम्हें दिल में जीने के लिए
    मैं तुम पर मरूँ।
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post'वनफूल'

    ReplyDelete

  2. गहन अनुभूति की रचना
    सुंदर
    बधाई

    ReplyDelete