Friday, 10 May 2013

श्राप-मुक्त Kavita 120

श्राप-मुक्त

तुमने कहा था
प्रेम में उम्र की कोई सीमा नहीं होती।
तुम्हारे प्रेम को मैंने दोस्ती का दर्जा दिया
तुम्हें श्राप-मुक्त किया।

तुमने कहा था
तुम मुझे देवी बना कर पूजोगे।
तुम्हारी भावना को मैंने पुत्रवत लिया
तुम्हें श्राप-मुक्त किया।

तुमने कहा था
प्रेम, प्रेम, प्रेम, और सिर्फ प्रेम।
तुम्हारे प्रेम को मैंने अपना श्रेय दिया
तुम्हें श्राप-मुक्त किया।

तुमने कहा था
तुम्हारा जीवन उलझनों से भरा है।
तुम्हारे कलंक को मैंने अपने सिर लिया
तुम्हें श्राप-मुक्त किया।

तुमने जो भी कहा था, क्यों कहा था?
मैंने जो भी सहा था, क्यों सहा था?
तुम्हारे हर कहे को मैंने अपने ऊपर लिया
तुम्हें श्राप-मुक्त किया।

No comments:

Post a Comment