Sunday, 12 May 2013

भ्रम Kavita 121

भ्रम

उसने आईने में देखा
चेहरे की झुर्रियों के पीछे से
एक छोटी सी लड़की झाँक रही थी
नव यौवन के द्वार पर खड़ी
हैरान, परेशान
किसी की प्रतीक्षा में
डब-डब आँखे
एक नाम पुकारने को आतुर
अधखुले होंठ
जैसे बरसों से सोई न हो
बिखरे बाल
बदहवास सी।
सालों साल बीत गए
इसकी उम्र उतनी की उतनी है
जितनी तब थी
जब वह इसे छोड़ कर गया था।
यह बड़ी क्यों नहीं हो रही?
इसकी आँखों में वही पुराने सपने हैं
उन सपनों में वही दहशत है
कि पूरे होंगे या नहीं?
हर उस उम्र का लड़का
इसे अपने उस जैसा लगता है।
यह आईना देखने से डरती है
इसके सपनों का राजकुमार
कहीं खो न जाए।
देख लेना
मरते समय इसकी आँखें खुली होंगी
अतृप्त कामनाएं
आँखों को मुंदने नहीं देतीं।
इसके हिस्से की प्यास
अभी बुझी नहीं है
जीर्ण-शीर्ण काया ले कर
यह अपने मन के भरोसे बुलंदियों पर है
रोज़ हंसती है, रोज़ रोती है
रात भर जगती है, दिन भर सोती है
सुना है इसने
रात को उतरते हैं आकाश से फ़रिश्ते
जो भी मांग लो उनसे
मुरादें होती हैं पूरी।
इसने मुट्ठियों में बंद कर रखे हैं सपने 
झोली में भर रखी हैं आकांक्षाएं
आँखों से टप-टप गिरने को पानी है
होठों पर पसरी है चुप्पी।
यह किसी से कुछ नहीं कहेगी
आकाश के फ़रिश्तों से भी नहीं
बस, अपनी धुन में मस्त
बढ़ रही है मृत्यु-पथ पर
प्रेम-पथ के भ्रम में
पगली कहीं की
ऐसा भी कहीं होता है?
भ्रम को एक साल, दो साल, दस साल
सारी उम्र कोई ढोता है?

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