Tuesday, 14 May 2013

यह सिलसिला पुराना है

यह सिलसिला पुराना है

जब इंद्र देवता ने गौतम ऋषि का रूप धारण कर ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित किया, वह बलात्कार था। यह बात दूसरी है कि रूप धारण करने के कारण वह कर्म म्युचुअल हुआ और उसमें बल का प्रयोग भी नहीं हुआ। इस प्रकार अहिल्या ने किसी शारीरिक तकलीफ का नहीं, बल्कि शारीरिक सुख का अनुभव किया। आश्चर्य है कि उपभोग के दौरान कहीं अहिल्या को यह नहीं लगा कि यह शरीर उसके पति का नहीं, किसी अन्य का है? एक-दूसरे की इतनी पहचान तो हो ही जाती है। हाथ की पकड़ और छुवन ही बता देती है कि यह स्पर्श अपने का नहीं, पराए का है। बाद में यह जानकारी होने पर भी कि वह उसका पति नहीं था, अहिल्या के मन की ग्लानि कहीं सामने नहीं आई। हाँ, दुःख उसे इस बात का रहा कि उसकी किसी गलती के बिना पति ने उसे पत्थर हो जाने का श्राप दिया। फिर संयोग या कमाल देखिए कि पत्थर से पुनः नारी रूप की प्राप्ति भी उसे परपुरुष (राम) के स्पर्श से ही मिली। यहाँ दो प्रश्न मेरे दिमाग में उभर रहे हैं।
1. तो क्या यह सच है कि अहिल्या इंद्र के साथ कर्म में बराबर की हिस्सेदार थी?
2. परपुरुष (सामान्य अर्थ में परनारी भी) के स्पर्श की महत्ता का गुणगान श्रृंगार रस के कवि बिहारी ने भी किया है। उन्होंने परकीया भाव को स्वकीया भाव से ऊपर रखा है। स्वकीया यानि अपनी पत्नी के प्रेम में वह ललक और तड़प नहीं है जो परकीया के प्रेम में होती है। तो क्या परपुरुष के स्पर्श के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता?

इसी सन्दर्भ में एक और बात। राजा-महाराजाओं के ज़माने में जो राजा संतान उत्पन्न करने में अक्षम होता था, उसे अपना वंशज पाने के लिए नियोग द्वारा संतान उत्पन्न करने की सुविधा थी। इसी विषय पर रचित एक नाटक 'सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक' में दिखाया गया था कि रानी को नियोग के लिए जब अन्य पुरुष के साथ रात गुज़ारने के लिए कहा गया तो सुबह होने पर रानी ने राजा के पास लौटने से इंकार कर दिया। .... स्त्री को उसके सुख की राह दिखाने की और उस सुख को पाने के लिए उसका आग्रह .... यद्यपि यह लेखक की कल्पना थी, जो उसने पुराने इतिहास से एक पराश्रित नारी पात्र को उठा कर यह दर्शाना चाहा कि स्त्री द्वारा अपने सुख की खोज और उसकी प्राप्ति के लिए राजपाट तक ठुकरा देने की कहानी मात्र आज की आधुनिकता की देन नहीं है। स्त्री के मन में चल रहे इस द्वन्द का सिलसिला बड़ा पुराना है।

इन दोनों पौराणिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं में पति के होते हुए भी अन्य पुरुष से प्राप्त शारीरिक सुख को महत्त्व दिया गया है। दोनों घटनाएं हमारी अनदेखी और काल्पनिक हैं। लेकिन आज के ज़माने में भी यह तथ्य उतना ही सत्य है, जितना तब था। ना जाने क्यों, यह बात मेरे गले नहीं उतरती। पति-पत्नी के रिश्ते की फिर अहमियत ही क्या रह जाएगी? इस तरह तो समाज में अराजकता फैल जाएगी।

1 comment:

  1. bhot gambhir mudda uthaya hai aapne..............aapki bato se sahmat hu

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