Friday, 24 May 2013

तुम हर क्षण में शामिल हो Kavita 123

तुम हर क्षण में शामिल हो

कभी ख़ुशी, कभी गम
कभी आँखें हंसती, कभी नम
कभी मन में विश्वास, कभी भ्रम
कभी तन का आलस, कभी श्रम
कभी यादों की भूल-भुलैया, कभी क्रम
कभी प्रिय का बिछड़ना, कभी संगम।

कल थी हाय हाय, आज मौजां ही मौजां
कल थी दुविधाएं, आज निश्चित दिशाएं
कल थी मारामारी, आज गूँजती किलकारी
कल आंसुओं की धार, आज हंसी की बौछार
कल मुश्किल था जीना, आज कौन चाहे मरना
कल सब कुछ नहीं नहीं, आज सब कुछ वहीँ का वहीँ।

तुम जब कहो जो, मैं तब सुनूं वो
तुम जब चुप हुए, मन में अँधेरे घुप हुए
तुम जब बोले, कानों में मधुर रस घोले
तुम जब पास थे, सदियों के उल्लास थे
तुम जब दूर हुए, देश-काल मजबूर हुए
तुम जब आओगे, सब कुछ वैसा ही पाओगे।

तुम जब कोई कहानी लिखो, मुझे प्रेम-दीवानी लिखो
मैं जब कोई कविता लिखूँ, तुम्हें भाव-हन्ता लिखूँ
तुम जब कोई गीत रचो, मेरे मन के मीत रचो
मैं जब कोई सपना देखूँ, तुम्हें बहुत ही अपना देखूँ
तुम जब कोई जीवन जीओ, वह मेरा ही जीवन हो
मैं जब कोई जीवन जीऊँ, तुम हर क्षण में शामिल हो।

No comments:

Post a Comment