Thursday, 30 May 2013

सोने के सिक्के

सोने के सिक्के

आपने बहुत सी ऐसी बातें सुनी होंगी कि सोने के जेवर की सफाई करने की बात कह कर लुटेरों ने औरतों को मूर्ख बनाया और उनके असली जेवर नकली गहनों से बदल दिए। मेरे साथ एक बार इससे विपरीत हुआ। मेरे शोरूम में एक मजदूर आया और चीज़ों के दाम पूछने लगा। मैंने सोचा, यह क्या खरीदेगा? लेकिन उसने एक छोटी दुर्गा की मूर्ती खरीदी और बोला, 'एक बात कहनी थी। आप मदद करें तो?'
'कहिए।'
'डर रहा हूँ ....'
'बेझिझक बोलो, क्या बात है?'
'मेरे पास कुछ सोने के सिक्के हैं, अगर आप खरीद लें तो?'
'सोने की दुकान पर जा कर क्यों नहीं बेचते?'
'आप खरीद लें।'
'चोरी का माल है?'
'नहीं ....'
'फिर ....'
'हम मिस्त्री हैं, घर बनाने का काम करते हैं, मेरा पूरा परिवार इसी काम में लगा है। ठेकेदार ने एक बहुत पुरानी बिल्डिंग को तोड़ कर नया मकान बनाने का काम दिया था। उस बिल्डिंग की दीवारों को तोड़ने पर हमें वहाँ लगभग तीन हज़ार सिक्के मिले हैं। हमें पूरा विश्वास है कि वे सिक्के सोने के हैं। आप उन्हें कहीं बिकवा दें।'
'तुम इतने विश्वास से कैसे कह सकते हो कि वे सोने के हैं? उनकी जांच करवानी पड़ेगी किसी सुनार से.'
'मैं अभी आता हूँ,' कह कर वह चला गया। एक घंटे के बाद वह अपनी माँ के साथ फिर उपस्थित हुआ। उसकी माँ ने अपने पल्लू से एक पोटली निकाली और उसे खोल कर अपनी दोनों हथेलियों में सोने के सिक्के भर कर मेरे सामने सामने रख दिए। सिक्के सुनहरी रंग में चमक रहे थे। 'ये बदरंग थे, हमने इन्हें रगड़-रगड़ कर धोया तो यह रंगत निकली,' वह बोली।
मैंने कहा, 'मैं किससे पता करूंगी कि ये असली हैं या नकली? आप लोगों ने मुझसे ही बात करने का क्यों सोचा?'
'आप औरत हैं, इसलिए। आदमियों से बात करने की हिम्मत नहीं हुई, कहीं हमें फंसवा दें,' मजदूर बोला, 'आप इनमें से कुछ ले लें, कल तक पता करलें, मैं कल फिर आऊँगा।'
मैंने एक सिक्का उठा लिया। ज्यादा नहीं, एक ग्राम तक का होगा। 'कुल कितने सिक्के हैं आप के पास?'
'तीन हज़ार।'
'कैसे गिने? तुम लोगों को इतनी गिनती आती है?'
'हमें सौ तक गिनती आती है। हमने गिन लिए। आप चाहें तो गिन लें। मैडम जी, हम कई महीनों से इन्हें संभाल-संभाल कर परेशान हो रहे हैं, समझ नहीं आता, इन्हें कहाँ छुपा कर रखें? आप इन्हें बिकवा दें तो हम पैसा लेकर अपने गाँव चले जाएंगे। वहाँ जाकर कोई अपना काम-धंधा करेंगे। मजदूरी छोड़ देंगे।'
मैंने मन ही मन हिसाब लगाया, यदि ये सिक्के वाकई सोने के हैं तो (उस समय के हिसाब से, उस समय रेट सात हज़ार रुपये प्रति दस ग्राम था) इनकी कीमत लगभग बीस लाख रुपये होगी। मैंने उनसे कहा, 'देखो, एक तरह से है तो यह चोरी का माल ही। खुदाई से जो भी चीज़ बरामद हो, उस पर सरकार का हक़ है। कोई बात नहीं, मैं इन्हें बिकवा भी दूं तो इतने पैसे आप कहाँ रखेंगे? मकान खरीदेंगे, कोई व्यापार शुरू करेंगे तो सवाल उठेगा कि आपके पास पैसा कहाँ से आया? यहाँ तक कि आप लोग अपनी हैसियत से ऊपर कपडे भी पहनेंगे तो लोगों की नज़र में आ जाएंगे। आप लोग इस पैसे को सिर्फ खा सकते हैं। इतने पैसे को आप छुपाओगे कहाँ?'
'मैडम जी, बिकने पर कुछ पैसे आप रख लेना, आखिर आप हमारा काम करवाओगे। हम अपनी हैसियत धीरे-धीरे ठीक करेंगे। नहीं तो मैडम जी, हम आपके पास ही छुपा कर रख देंगे। थोडा-थोडा आपसे लेते रहेंगे। लेकिन हमारा नाम कहीं पर ना आए।'
मेरे पास एक सिक्का छोड़ कर वे माँ-बेटे चले गए। मैंने देखा, उस छोटे से गोल सिक्के पर रानी विक्टोरिया का चेहरा बना था। मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानती थी जो पुराना सोना-चांदी खरीदने का काम करता था। मैंने उसे फोन करके कहा कि मुझे कुछ चांदी के सिक्के बेचने हैं। (संयोग से कुछ चांदी के सिक्के मेरे पर्स में थे जिन्हें मैं कई दिन से बेचना चाह रही थी, लेकिन बाज़ार जाने का वक्त नहीं मिल रहा था।) मैंने उस से यह भी कहा कि मेरी दादी के सामान में कुछ पुराने सिक्के निकले हैं, जिनकी जांच करवा के वो भी बेचने हैं। वह जौहरी अपने कांटे आदि के साथ उसी शाम को मेरी दुकान पर आ गया। पहले मैंने उसे चांदी के सिक्के दिए। फिर उसने सोने का सिक्का अपने लाए पत्थर पर घिसा, परखा और कहा, 'असली है। एक ग्राम का है, छह सौ रुपये दूंगा।'
मैंने कहा, 'आज रेट सात सौ का है तो सात सौ क्यों नहीं?'
'ये पुराने सिक्के हैं, विक्टोरिया के ज़माने के। इन्हें खुलेआम खरीद-बेच नहीं सकते। आजकल मार्केट में ये सिक्के काफी हैं। इसे अभी जाकर गला दूंगा। बाकी कब देंगी?'
'आपको फिर फोन करूंगी,' कह कर मैंने उसे वह सिक्का देकर छह सौ रुपये लिए और विदा किया।
अगले दिन वह मजदूर आया। मैंने उसे बताया कि मैंने जांच कराई थी, वह सिक्का असली सोने का है। उसने आगे कुछ नहीं सुना, बोला, 'बाद में आऊँगा, वह सिक्का आप रख लें,' और चला गया। शायद पुष्टि हो जाने के बाद वह ख़ुशी मिश्रित घबराहट संभाल नहीं पाया। शायद उसके बाद वे लोग अपने गाँव चले गए हों। मुझे नहीं मालूम, उनका क्या हुआ।
आश्चर्य की बात देखिए, अभी कुछ दिन पहले फिर एक मजदूर ने इसी तरह की कहानी सुना कर बताया कि उसके पास दस सिक्के हैं, सिक्के क्या, छोटी सी ईंट है, हरेक पर विक्टोरिया का चेहरा है, एक सिक्के का वज़न 950 ग्राम है (यानि 95 तोले, यानि आज के रेट के हिसाब से दस सिक्के लगभग ढाई करोड़ रुपये के।) 'मैं कहाँ बिकवा दूं भई, मैं किसी को नहीं जानती,' मैंने कहा, क्योंकि अब वह पुराना सोना खरीदने वाला ना जाने कहाँ है?
'मैडम जी, आप एक सिक्का ले लें और मुझे सिर्फ दस लाख रुपये दे दें।' (एक की कीमत लगभग पच्चीस लाख है.)
'ओये, मैं कहाँ से ले लूं? मेरे पास दस लाख कहाँ हैं? हाँ, अगर एक लाख में देना है, बिना जांचे-परखे तो ले आओ।'
वह नहीं लाया। उधर बेटे ने चेतावनी दी, 'मारी जाओगी इस चक्कर में। जितने गहने पहने हुए हैं, सब उतार के ले जाएगा।'
मुझे अभी भी यकीन है कि हमारे देश की पुरानी इमारतों की दीवारों में, जड़ों में अंग्रेजों के ज़माने का सोना गड़ा हुआ है। और मुग़ल ज़माने की इमारतों में भी। लेकिन सोने के लालच में इमारतों को ध्वस्त करने का ना सोचा जाए क्योंकि इन इमारतों का ऐतिहासिक महत्त्व है और इनकी पुनर्रचना अधिक महंगी पड़ेगी।

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