Wednesday, 22 May 2013

अलग विधाएं

अलग विधाएं

महाकाव्य, प्रबंध काव्य आजकल जैसे पुरानी विधाएं हो गई हैं। ये उस ज़माने में लिखे जाते थे जब कविता तुकान्त होती थी। कविता के अतुकांत और गद्यात्मक हो जाने से, साथ ही उसे अकविता के दौर से भी गुजरने से लोग कविता ही पढ़ लें तो बहुत है। कवितायेँ बहुतायत में लिखी जा रही हैं, शायद इसलिए भी कि गद्यात्मक हो जाने के कारण कविता लिखना आसान समझा जाता है। छंदोबद्ध लिखने वाले भी छंद की ओर ज्यादा ध्यान नहीं देते। लय और तुक कहीं जा रही है, भाव हैं भी या नहीं, कोई ध्यान नहीं देता। पहले कवितायेँ ही लिखी जाती थीं। वीर रस, भक्ति रस, श्रृंगार रस, हर रस की कवितायेँ लिखी गईं लेकिन गद्य साहित्य की रचना उस मात्रा में नहीं हुई। कबीर, रहीम, सूरदास, किसने महाकाव्य लिखा? दोहे, चौपाई, लिख कर सब मशहूर हुए।

कविता वर्सेस महाकाव्य और कहानी वर्सेस उपन्यास को एक ही तराजू में नहीं तोला जा सकता। जो लोग किसी कहानीकार से कहते हैं कि आपने कहानियाँ बहुत लिख लीं, अब आप उपन्यास लिखिए, वो यदि प्रकाशक हैं तो एक जाने-माने कहानीकार के नाम को भुनाना चाहते हैं क्योंकि उपन्यास कहानी से ज्यादा बिकता है। जो मित्र ऐसा कहते हैं, वे नासमझ हैं, उन्हें नहीं पता कि
कहानी और उपन्यास दो अलग-अलग विधाएं हैं। दोनों में एक सामान जो तत्व है, वह है कथा, शायद इसीलिए यह समझ लिया जाता है कि जो लेखक कहानी लिखने में पारंगत है, वह उतना ही सफल उपन्यास भी लिख सकता है। उपन्यास के लिए एक बहुत बड़े फलक, समय और एकाग्रता की ज़रुरत  है। कहानी अपने आप में एक सशक्त विधा है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी तीन कहानियाँ लिख कर ही प्रसिद्ध हो गए। इसलिए यह ज़रूरी नहीं कि हर कहानीकार उपन्यास भी लिख सकता है या उसे लिखना ही चाहिए।

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