Wednesday, 8 May 2013

दरवाज़ा खोलो Kavita 119

दरवाज़ा खोलो

बुद्धम् शरणम् गच्छामि
धम्मम् शरणम् गच्छामि
प्रभु, तव शरणम् गच्छामि
शेष नहीं कुछ आगामी।

दरवाज़ा खोलो
मुझे आना है।

भीतर जम रही है एक शिला बर्फ की
बाहर झुलस रहा है प्रचंड ताप
अधम-से-अधम को अपनाने की जिद थी
कि शायद कटे मेरा भी कोई पाप।

दरवाज़ा खोलो,
मुझे भीतर आना है।

खंडित हुए सारे भ्रम
नाकामी का रहा हर श्रम
लालसाएं हुई अशेष
पूरा हुआ श्रापों का क्रम।

अब दरवाज़ा खोलो
मुझे आना है।

कितना भोगा सुख, अहा
कितना भोगा दुःख, आह
न गर्व, न पश्चाताप
अब केवल आप ही आप।

अब तो आने दो
तुम्हारे पास आना है।

मा तमसो ज्योतिर्गमय
ख़ाक हुआ प्रभु सारा समय
शांत हुई मन की सब प्रलय
ग्रहण करो यह अंतिम निर्णय।

नीचे की दुनिया देख चुके
अब ऊपर जाना है।

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