Friday, 31 May 2013

या तो Kavita 124

या तो

या तो सर-आँखों पर बैठाओ
या झुको और पांवों को हाथ लगाओ
असमंजस में कुछ नहीं।

या तो शत-प्रतिशत अपनाओ
या शत-प्रतिशत दूर हो जाओ
बीच की कोई स्थिति नहीं।

या तो खाने में पकवान हों
या निर्जल उपवास हो
अल्पाहार स्वीकार नहीं।

या तो चाँद-तारों से भरी रात हो
या अंधेरों में आवास हो
धुंधलके पसंद नहीं।

या तो भावों के ज़लज़ले हों
या मन सन्यासी हो
व्यर्थ की दुनियादारी नहीं।

या तो आंधी-तूफ़ान हो
या सूखा अकाल हो
बेमौसम बरसात नहीं।

या तो किसी का इंतज़ार हो
या कोई ना बहार हो
व्यर्थ खलबली नहीं।

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