Saturday, 1 June 2013

शोक गीत Kavita 125

शोक गीत

ज़िन्दगी बीतती नहीं
भ्रम है कि बीत रही है
बार-बार शुरू होती है
बार-बार ख़त्म
पूरी नहीं होती कभी
बस रहता है भ्रम
कि पूरी हो रही है।

आंसुओं को कितना भी गिरा लो
खुद को समझा लो
पर क्या चाहने से कुछ होता है?
होना होता तो वही ना होता
जो चाहा था?
वही ना मिलता
जो खुद चल कर आया था?

मृगतृष्णा है सब
तेरा, मेरा, इसका, उसका
नज़र आता है पर होता नहीं
भागो, पीछे-पीछे भागो
मुट्ठियों में क्या बाँधी जा सकती है
रेत? हवा?
दिल के जलने की कोई नहीं है दवा।

क्यों आते हैं झटके?
दिमाग के हिल जाते हैं तार
ख्वाब देखना मना है
देखें भी तो किसके?
उस निर्मोही के?
जिसे पता ही नहीं था
मोह क्या होता है?

मोह के बिना उलझाया उसने मोह में
अपने हिसाब से जोडे-तोड़े
रिश्तों के आंकड़े
उसके दिल की जगह दिल नहीं था
वह किसी बंजर में
पत्थरों के बीच रह रहा था
अब गाते रहो शोक-गीत रात-दिन।

3 comments:

  1. क्या बात है वाह वाह

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  2. मृगतृष्णा है सब
    तेरा, मेरा, इसका, उसका
    नज़र आता है पर होता नहीं
    भागो, पीछे-पीछे भागो
    मुट्ठियों में क्या बाँधी जा सकती है
    रेत? हवा?
    दिल के जलने की कोई नहीं है दवा।-----

    जीवन की मर्म की गहन अनुभूति
    गजब की प्रस्तुति

    आग्रह है पढें,ब्लॉग का अनुसरण करें
    तपती गरमी जेठ मास में---
    http://jyoti-khare.blogspot.in

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  3. abhaar!
    moh ke vyomohan ko prkat karti huyeee rchna.
    vastv men ye vyomohan krtya ko aur klisht aur gahvr kr deta hai.

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