Monday, 10 June 2013

जानेमन Kavita 129

जानेमन

तुम्हारे गोदाम में भरी हैं ठहाकों की बोरियां
पर जानेमन, हँसते हुए तो कम ही नज़र आते हो।

कभी यह बहाना तो कभी वह बहाना
अब जानेमन, हम ही से अपने दर्द को छुपाते हो।

क्यों रोज़ ऐसे मीठे-मीठे ख़त नहीं लिखते
क्यों जानेमन, मिन्नत को सरेआम ठुकराते हो?

यह फूल तुम्हें भेज रही हूँ संभाल लो
ज्यों जानेमन, खुशबू से अपने दिल को महकाते हो।

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