Wednesday, 12 June 2013

मन का द्वन्द Kavita 130

मन का द्वन्द

मैं यहाँ मर रही हूँगी
तुम वहां मर रहे होगे
और ये किस्से
अखबारों में छप रहे होंगे ।

तुमने जैसा भी किया
मैंने जैसा भी किया
प्यार तो था वो
जिसने जैसा भी किया।

तुम बड़े विचित्र हो
सच में हो कमाल
वक़्त कैसे कटेगा
फैले हैं लाखों सवाल।

मेरा मन कुछ भी नहीं
तुम्हें बस अपनी ही बात
दिल लगाना दिल्लगी
खेलने को हैं जज़्बात।

शब्दों के ढेर में कहीं
अर्थ का पता नहीं
इंतज़ार में
बैठी हूँ कब से यहीं।

जिसका कोई अंत नहीं
वह शुरू ही क्यों हुआ
मन का द्वन्द मिटे 
जैसे कुछ नहीं हुआ।

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