Monday, 17 June 2013

मैं उसकी शुक्रगुजार हुई Kavita 131

मैं उसकी शुक्रगुजार हुई

कुछ-कुछ मीठा कुछ-कुछ तीखा 
जगमग-जगमग भीगा-भीगा
जब मिलने को तैयार हुई।

कभी बजे संगीत नगाड़े
कभी स्वयं ही काम बिगाड़े
शीतल धरती अंगार हुई।

नचना-गाना भी भर-भर के
रोना-धोना भी मर-मर के
हंसती सी अश्रु-धार हुई।

महके कभी विलासी गंध
कभी हँसने पर प्रतिबन्ध
बेड़ी ज्यों बंदनवार हुई।

कभी उपजे बंजर-बंजर
कभी साजे खंजर-खंजर
जिह्वा जैसे तलवार हुई।

वो मुझ जैसा मैं उस जैसी
वो मेरे मन मैं उसके मन
मैं उसकी शुक्रगुजार हुई।

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