Friday, 21 June 2013

पुण्य Kavita 135

पुण्य

उसने मुझे मेरे एकांत से निकाल कर
दुनियादारी की दलदल में धकेला
मेरे पुण्य पीछे रह गए
उसके पाप मेरे आगे-आगे चलने लगे।

ह्रदय में उगता कोमल भाव था
पर निरंतरता का अभाव था
उसके पास अपने लिए कुछ भी नहीं
मेरे लिए चुल्लू भर पानी था।

अब मैं वापस अपने पुण्य में हूँ।
किसी बहार में नहीं, शून्य में हूँ
मुझ तक कोई आवाज़ नहीं पहुंचेगी
मेरी इन्द्रियाँ मर चुकी हैं।

आत्मिक शक्तियां फिर से लौटेंगी
आत्म-नियंत्रण आत्मज्ञान लौटाएगा
रोशनी फैलेगी अंधेरों में
फिर से जागेगी कला।

फिर से अपनी इच्छा शक्ति से
हवा का रुख मोड़ सकूंगी।
जो पीड़ा का कारक हो
उसे आसानी से छोड़ सकूंगी।

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