Thursday, 20 June 2013

अनुत्तरित Kavita 132

अनुत्तरित

उसके पास भूलने के बहाने इतने हैं
कि वह मुझे अकसर भूल जाता है
वह यह भी भूल जाता है
कि मैं ही हूँ वह रास्ता
जिस पर चल कर
उसे अपना रास्ता बनाना है।
मैं ही हूँ वह सपना
जो उसे अपनी आँखों में सजाना है।
मैं ही हूँ वह रंग
जो उसे अपने बेरंग दिनों पर बरसाना है।
वह चलेगा तो मैं भी चलूंगी।
मेरे सपने उसी से सजते हैं।
मेरे बेरंग दिनों पर वह
रंग बन कर बरसा है।
वह उधर सूखता है तो मैं इधर सूख जाती हूँ।
वह उधर चुप होता है तो मैं इधर चुप हो जाती हूँ।
वह उधर मरता है तो मैं इधर मर जाती हूँ।
यह रिश्ता देह का नहीं, संदेह का नहीं।
मिलन का नहीं, बिछड़न का नहीं।
संवाद का नहीं, विवाद का नहीं।
हार का नहीं, जीत का नहीं।
कभी शुरू हो, ऐसी प्रीत का नहीं।
गुनगुनाया जाए, ऐसे गीत का नहीं।
तो क्या है? तो क्या है?
रोज़ आकाश की ओर देख कर उजालों से पूछती हूँ
रोज़ मन के तहखानों में जाकर अंधेरों से पूछती हूँ
रोज़ अनुत्तरित लौट आती हूँ।

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