Friday, 21 June 2013

वाचाल Kavita133

वाचाल

आपने कहा था, मैं बहुत वाचाल हूँ
पता नहीं, क्यों कहा था?
मेरे ना बोलने पर भी आपने
क्या-क्या सुन लिया था?

मैंने वही सुना, जो आपने कहा था
कितना ज्यादा बोले थे आप
कि मेरे लिए आश्चर्य और आकर्षण
दोनों का कारण बने।

बहक रही थी दिशाएं
नियति का अनोखा परिहास था
फिर भी मैंने कुछ नहीं कहा था
हवा के तेज़ झोंके को मौन हो कर सहा था।

क्यों मैं हर बार इतना चुप रही थी?
बाहर धूप, भीतर बर्फ पिघल रही थी
आपके शब्दों के ढेर मेरे सामने थे
जैसे प्रकृति का कहर मुझ पर टूटा था।

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