Sunday, 23 June 2013

किस्सा हुआ ख़त्म Kavita 137

किस्सा हुआ ख़त्म

तुम्हें ज्यादा वक़्त लगा सच बोलने में
मुझे कम वक़्त लगा सच समझने में।

तुम सच बोलने से डरते थे
मैं सच सुनने से डरती थी।

तुम झूठ बोल कर मुझे खुश करते थे
मैं सच समझ कर तुम्हें दुखी करती थी।

तुम मेरे झूठ को सच समझते थे
मैं तुम्हारे सच को झूठ समझती थी।

तुम अपने झूठ से मुझे खुश करते थे
मैं अपने सच से तुम्हें दुखी करती थी।

चलो, अब किस्सा हुआ ख़त्म
प्यार की अब न कोई रीत, न कोई रस्म।

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