Wednesday, 26 June 2013

कोई यूँ आके चला गया Kavita 138

कोई यूँ आके चला गया

कोई यूँ आके चला गया
कि जैसे कंठ रूँधे मेरा
मेरी आवाज़ चली जाए
कि मैं कुछ जान नहीं पाई
कि कब यह मनवा छला गया।

किसी ने कब दरवाज़े तोड़
किया अधिकार बिना पूछे
कि जैसे आग रही थी खेल
ध्वंस विध्वंस मचा हर ओर
कोई चुपचाप गया सब छोड़।

कभी मीठी रुनझुन रुनझुन
मेरी साँसों में घुलती सी
मुझे मदमस्त बनाती सी
कि अब सुनसान पड़ा है सब
न जाने कहाँ हुई मैं गुम।

कि उसका संदेशा आया
कि आओ लौट चलें पीछे
कि जैसे हुआ नहीं हो कुछ
मिटा दें सब जो कभी लिखा
भुला दें सब जो कभी कहा।

कहानी पूरी नहीं हुई
कि भावों का भडार लुटा
कि कागज़ कोरे पड़े रहे
कि आँखों में छलछल आँसू
विदाई दिल से नहीं हुई।

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