Thursday, 27 June 2013

तुम सर्वस्व हो Kavita 139

तुम सर्वस्व हो

तुम्हारा कोई रूप नहीं
तुम अमूर्त हो
तुम्हारा कोई आकार नहीं
तुम निराकार हो
इसीलिए अद्वितीय हो।

तुम्हारा कोई नाम नहीं
तुम्हारा कोई धाम नहीं
तुम्हारी कोई जाति नहीं
तुम्हारा कोई धर्म नहीं
इसीलिए विशिष्ट हो।

तुम किसी देश में नहीं
तुम किसी काल में नहीं
तुम किसी क्रीडा में नहीं
तुम किसी प्रपंच में नहीं
इसीलिए निःसंदेह हो।

तुम निर्मिति में नहीं
तुम विनाश में नहीं
तुम अँधेरों में नहीं
तुम उजालों में नहीं
इसीलिए सर्वत्र हो।

तुम न सन्देह हो
तुम न संताप हो
तुम न परिहास हो
तुम न विलाप हो
इसीलिए अट्टहास हो।

तुम कोई नहीं हो पर हर कोई हो
तुम कहीं नहीं हो पर हर कहीं हो
तुम कुछ नहीं हो पर सब कुछ हो
तुम क्या नहीं हो पर क्या-क्या हो
इसीलिए ख़ास हो।

तुम मेरा सुख भी हो
तुम मेरा दुःख भी हो
तुम मेरी ख़ुशी भी हो
तुम मेरा गम भी हो
इसीलिए संकल्प हो।

तुम जैसे दूर गगन हो
तुम जैसे चलती पवन हो
तुम जैसे जलती आग हो
तुम जैसे अधूरी प्यास हो
इसीलिए अहसास हो।

तुम न होकर भी विद्य हो
तुम न दिख कर भी दर्श्य हो
तुम मौन होकर भी श्रव्य हो
तुम छूए बिना स्पर्श्य हो
इसीलिए सर्वस्व हो।

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