Saturday, 29 June 2013

मन सन्यासी Kavita 140

मन सन्यासी

मन सन्यासी
तुम एक पत्थर
बैठ गई हूँ पास तुम्हारे
मोह नहीं है
एक पत्थर से कैसा मोह?

जग आभासी
थकी हुई मैं
दो पल को आराम करूँ
सच पूछो तो
रुकना कितनी देर यहाँ?

भोग विलासी
कभी नहीं थी
फिर अब तो सब छोड़ चुकी
तुम भी निर्धन
पास तुम्हारे क्या देने को?

तुम रंगरासी
शब्द तुम्हारे
यहाँ वहाँ बस फिसल रहे
तुम अज्ञानी
अपने ही शब्दार्थ नहीं समझे?

मात्र दिलासी
कहने भर को
फूल तुम्हारी बातों के
तुम क्या जानो
कितने काँटे मुझ में चुभे हुए?

आज खुलासी
मेरे मन की
पास नहीं अब आना तुम
मैं वैरागी, दुनिया त्यागी
दुनिया में शामिल तुम भी।

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