Monday, 3 June 2013

कड़वा सच

कड़वा सच

आराधना चतुर्वेदी के 'संस्मरण' से मन विचलित हो गया और मुझे एक घटना याद हो आई। मैंने आज तक इसे नहीं लिखा। आराधना ने हिम्मत दी, जब वह अपने जीवन के इस सच को बयान कर सकती है, तो मैं क्यों नहीं? क्योंकि इस सच का बाहर आना समाज को जागरूक एवं सजग बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है। लेखक स्वयं को अनावृत्त करके समाज के कुकर्म उजागर करता है और उनसे निजात पाने की दिशा की ओर संकेत करता है।

परिवारों में चचेरे-ममेरे भाई या चाचा-मामा की वर्जनीय हरकतों के द्वारा बच्चियों को एक दहशत के दौर से गुज़रना पड़ता रहा है। इस तरह की घटनाएं संयुक्त परिवार में आम हैं। पहले यौन प्रताड़ना के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होती थी। आज जैसी जागरूकता नहीं थी कि सीधा पुलिस में रिपोर्ट कर दो। बदनामी के डर से भी लडकियां और घरवाले डरते थे। आज समाज में जागरूकता है इसलिए ये बातें खुल कर सामने आ रही हैं। मुझे लगता है कि ऐसी डर और दहशत की मनोभूमि से हर लड़की गुजरी होगी। बचपन में हुए ऐसे किसी भी हादसे का दुष्प्रभाव एक बालमन और किशोरमन पर क्या पड़ता है तथा बड़े होने पर भी लड़कियों को किस विसंगति के अहसास से गुज़रना पड़ता है, इसकी ओर ध्यान देने की और इसका उपचार खोजने की आवश्यकता है।

मेरे साथ भी बिलकुल ऐसी ही घटना घटी थी और किस्मत ही अच्छी थी कि कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ। मेरी बारह साल की उम्र में घटी इस घटना को हालांकि मैं भूल चुकी थी लेकिन इस का दुष्प्रभाव एक भय के रूप में मेरे साथ बहुत लम्बे अरसे तक चला। मुझे हमेशा डरावने अपने आते कि कोई सोते समय मेरी चादर खींच रहा है, कोई मेरे पलंग के चारों ओर चल रहा है, किसी के पांवों की आहट मुझे चौंका जाती, बेवजह मुझे अपने कंधे पर किसी का हाथ महसूस होता आदि आदि। क्योंकि बड़े होने तक मैं इस घटना को भूल चुकी थी, इसलिए मैंने इन बातों का सम्बन्ध किसी ह्रदय-रोग से समझा और एस्कोर्ट्स हॉस्पिटल में अपनी जांच तक करवाई।

लेकिन इसका सही इलाज किया मेरे पुत्र ने। उस समय वह बीस-इक्कीस साल का था। हम जॉर्जटाउन, गयाना में थे। मुझे रोज़ रात को डर लगता, सपने में लगता, कोई खिड़की से आ रहा है, कोई दरवाज़े से आ रहा है, मेरे बाजू किसी हाथ की पकड़ के वज़न से इतने भारी हो जाते कि मैं सपने में चीखती, कोई मुझे उठाओ पर मेरा सपना नहीं टूटता और दहशत में रात गुज़रती। एक रात मैंने बेटे से कहा, 'मैं रात भर चीखती हूँ, तू मुझे नींद से उठा दिया कर।'

उसने कहा कि उसने मेरी कोई चीख नहीं सुनी। वह बोला, 'आज से हम एक ही कमरे में सोएंगे।' फिर उसने पूछा, 'आपको डर में क्या महसूस होता है?'

मैंने बताया कि जैसे मेरी बांह किसी ने जोर से पकड़ रखी है। उसने कहा, 'याद करो, कभी किसी ने इतने जोर से आपकी बांह पकड़ी थी, नाना ने, मामा ने? शायद उन्होंने कभी आपको पीटा हो?'

मेरे इनकार करने पर भी वह पूछता रहा, 'याद करो, याद करो .... किसी और ने बचपन में कभी आपकी बांह पकड़ी थी?'

मुझे एकदम वह सब याद आया जो मैं भूल चुकी थी। मैंने उसे सारा किस्सा सुनाया। पहले तो उसने मेरे उस कजन, जो उसका मामा लगता था, को गाली दी, 'उन कमीनों के परिवार से अभी भी तुम मिलती-जुलती हो।'

'क्या करूँ, रिश्तेदारी है, मरने-जीने में जाना पड़ता है।'

उसने कहा, 'आप उसकी नीच हरकत को भूल गईं, इसीलिए वह सपनों में आकर आपको डराता है। उसे भूलो नहीं, मन में उसे गोली मारो।'

'ओह बेटा, तुम तो बहुत अक्लमंद हो गए? यह मनोवैज्ञानिक तरीका तो मुझे मालूम ही नहीं था।'

उसके बाद मुझे आज तक कभी डर नहीं लगा। शायद मेरा डर ख़त्म होने का एक यह भी कारण रहा हो कि मैंने पहली बार (पुत्र के, यानि किसी के भी) सम्मुख इस छुपे हुए दर्द को बयान किया था। लेकिन जो लम्बा वक्त मैंने डरते हुए गुज़ारा, हर लड़की को उससे क्यों गुज़रना पड़े? लड़कों को जन्म से ही रिश्तों की पवित्रता और महिमा का पाठ पढ़ाना चाहिए। ये संस्कार केवल माँ-बाप दे सकते हैं, अन्य कोई नहीं।

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