Sunday, 30 June 2013

फर्क हमारे बीच Kavita 141

फर्क हमारे बीच

तुम सुन्दर और यौवन से भरपूर
मैं साधारण रही उम्र से जूझ
फर्क हमारे बीच, क्या गहना, क्या कीच?

तुम सुन्दर और सजे हुए
मैं साधारण बुझी हुई
तुम झूठ हँसे, तुम कहाँ फँसे।

तुम सुन्दर और श्वेत वर्ण
मैं साधारण श्याम वर्ण
तुम बदहाली, मैं खुशहाली।

तुम सुन्दर पर खड़े किनारे
मैं साधारण बीच धार
तुम डर-डर के, मैं आर-पार।

तुम सुन्दर पर सँभल-सँभल
मैं साधारण धुआँधार
तुम कभी-कभी, मैं बार-बार।

तुम सुन्दर पर ठहरा जल
मैं साधारण बहती सी
तुम गतिहीन, मैं गतिशील।

तुम सुन्दर पर रुके हुए
मैं साधारण संचालित
तुम जिज्ञासु, मैं सम्मानित।

तुम सुन्दर पर अनजाने
मैं साधारण सुप्रसिद्ध
तुम किंचित, मैं सर्वोचित।

तुम सुन्दर पर लुप्तप्रायः
मैं साधारण श्लाघनीय
तुम सुप्त-भाग्य, मैं वैभव।

तुम सुन्दर पर प्रश्नाकुल
मैं साधारण प्रश्नातीत
तुम स्नेहाकुल, मैं स्नेहसिक्त।

तुम सुन्दर पर भँवरजाल
मैं साधारण मुक्ताकाश
तुम प्रच्छन्न, मैं प्रकाश।

तुम सुन्दर पर कुछ विक्षिप्त
मैं साधारण हूँ निर्लिप्त
तुम प्यासे, मैं तृप्त।

सुन्दर और साधारण क्या?
तुम बहुत आम, मैं बहुत ख़ास।
फिर भी हम दिल के बहुत पास।

No comments:

Post a Comment