Tuesday, 4 June 2013

मैं तुम्हारे लिए मरुँ Kavita 126

मैं तुम्हारे लिए मरुँ

तुम मेंरे लिए ना बने
मैं तुम्हारे लिए ना बनी
फिर भी क्यों हम
एक दूसरे को छाया देते हुए
तप रहे हैं खुद?

रास्ते टूटे-फूटे हैं
मंजिल का अता-पता नहीं
चलते जा रहे हैं फिर भी
एक-दूसरे का हाथ पकडे
अँधेरा है घुप।

बंदिश में तुम हो
गर्दिश में मैं हूँ
उम्मीदें हैं कि टूटती नहीं
बर्बादी दिख रही है साफ-साफ
फिर भी हैं चुप।

कभी प्यार की खनक है
कभी गुस्से की सनक है
मौसम में महकता खुमार है
गलतफहमियों का भी अम्बार है
जीयें कैसे उफ़ उफ़।

मैं तुम्हारे लिए जीवन-गीत गाऊँ
तुम मेरे लिए मन्नतें माँगो
मैं तुम्हारे लिए मरुँ
तुम मेरे लिए जीयो
इससे बड़ा कोई नहीं सुख।

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. अद्भुत भाव ! अति सुन्दर कविता । बधाईं।

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  3. रास्ते टूटे-फूटे हैं
    मंजिल का अता-पता नहीं
    चलते जा रहे हैं फिर भी
    एक-दूसरे का हाथ पकडे
    अँधेरा है घुप।--------
    वाह बहुत गहन अनुभूति
    सुंदर रचना

    आग्रह है
    गुलमोहर------

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