Wednesday, 5 June 2013

ग़ज़ल 24

ग़ज़ल 24

तुमने आज कैसा शब्द-जाल बिझाया
किन नए अर्थों में मुझे आज उलझाया?

पहले तुम ऐसे नहीं आए नज़र मुझे
आज यह एकदम नया सा रूप दिखाया।

किन अँधेरों के तुम अभ्यस्त हो गए
एक छोटी सी किरण ने तुमको डराया।

काँटों पर चलने की आदत हुई ऐसी
फूल भी जो तुम्हें चुभता नज़र आया।

कहकहे भी अब डरा जाते हैं तुम्हें
चौंक जाते हो फ़िज़ूल देख कर छाया।

तुम मनोरोगी, तुम्हारा हाल अजब है
मैं मनोरोगी, तुम्ही ने रोग लगाया।

खोल दो मन में जो गाँठें बाँध रखी हैं
ज़िन्दगी ने देखो क्या रंग बिखराया।

कभी वह उन्मुक्त हँसी, कभी यह रुदन
मैं नहीं पाती समझ इस खेल की माया।

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