Thursday, 6 June 2013

असमंजस में प्राण Kavita 128

असमंजस में प्राण

सुना है
हज़ारों साल पुराने
सूखे पत्तों पर लिखा होता है
जन्म-जन्मान्तर का हाल।

एक जर्जर पत्ते पर लिखा था
सच में यह कि
पिछले जन्म में वह मेरा कोई ख़ास था।
क्या भरोसा?

शायद इसीलिए इतना सताता है
रौब तो देखो
जैसे मुझे खरीदा हुआ है
कहता है इसे प्यार।

करता तो है
लिखता है कि करता है
करता ही होगा
तभी तो नहीं छोड़ता लड़ाइयों के बावजूद।

मैंने उससे माँगा
उसके अँगूठे का निशान
पता करना चाहती थी
वह मेरे नसीब में लिखा है या नहीं।

उसने नहीं दिया
उसे डर था
कहीं मैं उसके दुःख
अपने नाम न लिख लूँ।

अँगूठे का निशान
हस्ताक्षर होता है ना
वह अपने दुखों की वसीयत
नहीं लिखना चाहता मेरे नाम।

मैं अपने सुख देना चाहती हूँ उसे
कैसे दूं?
उसके नसीब में होंगे
तभी ना उसे मिलेंगे।

लेना भी तो नहीं लिखा होता
हरेक के नसीब में
देने वाला दे भी तो कैसे दे?
असमंजस में प्राण।

No comments:

Post a Comment