Thursday, 6 June 2013

ग़ज़ल 25

ग़ज़ल 25

ये आंसुओं के धारे कि ये गम के सिलसिले
इनसे नहीं बनेंगे कोई गढ़, कोई किले।

ये आज जैसे आज के गम बीत जाएंगे
कल को रहेंगे न कोई भी आज के गिले।

मन के मुरझाने से ना मुरझाएगा जीवन
भर जाएंगे जल्दी ही ये ज़खम छिले-छिले।

मौसम कभी भी एक जैसा रह नहीं सकता
कल की सुबह ले आएगी कितने सुमन खिले।

क्या पता कब कौन आएगा अचीन्ही राह से
गुनगुनाते गीत-सा मन का कोई मिले। 

1 comment:

  1. बहुत अच्छा लगा पढ़ कर ...

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