Friday, 21 June 2013

बदहवासी Kavita 136

बदहवासी

कुछ तो ज़रूर होता होगा पूर्व जन्म
इसीलिए तो मैं और तुम
कभी इस और कभी उस
रिश्ते में बँध रहे हैं
बार-बार टूट-टूट कर
बार-बार जुड़ रहे हैं।

बहती हुई नदी को बाँधने की जिद तुम्हारी
सूखे पड़े सहरा में भीगने की जिद मेरी।
नदी को बाँधा नहीं जा सकता
सुखाया जा सकता है।
सहरा में आते हैं
प्यासे रहने को अभिशप्त जो।

चाहने से भी जो ख़त्म नहीं होता
उसका नाम तुम लेते हुए डरते हो
चाहने से भी जो शुरू नहीं होता
उसका नाम मैं लेते हुए मरती हूँ।

मुझे ऐसे किसी रिश्ते की चाह नहीं
जिसे निरंतरता के साथ निभाना पड़े।
शायद मैं इस काबिल नहीं
शायद तुम भी इस काबिल नहीं।

मैं अपने आप में गुम रहती हूँ
बदहवासी से सन्न और
मानसिक तौर पर सुन्न रहती हूँ
जीना है क्योंकि मर नहीं सकती
जीने का वरदान मिला है
जीने के आधार के बिना।
वक़्त काटने के लिए साधन
फिर भी चाहिए होता है।

जीवन के उलझे धागे सुलझाने के लिए
अब मैं अपने साथ खुद हूँ।
पर अब धागे उलझेंगे क्यों?
अकेलों के धागे नहीं उलझा करते।

No comments:

Post a Comment